“घर, नौकरी, बच्चों और रिश्तों की जिम्मेदारियों के बीच महिलाओं की नींद सबसे पहले कुर्बान होती है।”
रात के दो बजे हैं। घर के सभी लोग सो चुके हैं, लेकिन एक महिला अब भी जाग रही है—कभी रसोई समेटते हुए, कभी अगले दिन की तैयारी करते हुए और कभी अपने भीतर उमड़ते तनाव से जूझते हुए। सुबह फिर वही दिनचर्या शुरू होनी है। धीरे-धीरे यह जागना आदत बन जाता है और फिर एक दिन नींद सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि एक सपना लगने लगती है।
दिल्ली निवासी बेनजीर हिना की कहानी आज लाखों महिलाओं की कहानी है। गर्भावस्था के दौरान घर, पति और नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अपनी नींद खो दी। आज भी वह रातों को पूरी तरह आराम नहीं कर पातीं। यह केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की बड़ी और गंभीर समस्या बन चुकी है।
वैश्विक संकट बनती जा रही है नींद की कमी
विश्व स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी कंपनी द्वारा किए गए एक वैश्विक सर्वेक्षण ने चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं। दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। तनाव, चिंता और आर्थिक दबाव लोगों की रातों की शांति छीन रहे हैं।
भारत की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बताई गई है, जहां लगभग 69 प्रतिशत लोग नींद की कमी से प्रभावित हैं। महिलाओं की स्थिति पुरुषों की तुलना में और भी खराब है। पुरुष जहां सप्ताह में औसतन चार दिन अच्छी नींद ले पाते हैं, वहीं महिलाएं इससे भी कम आरामदायक नींद ले पाती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं का मानसिक और शारीरिक श्रम पुरुषों की तुलना में अधिक जटिल होता है। वे एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाती हैं—घर संभालना, बच्चों की देखभाल, नौकरी, सामाजिक रिश्ते और परिवार की भावनात्मक जरूरतें। यही कारण है कि उनके मस्तिष्क और शरीर को अधिक आराम की आवश्यकता होती है, लेकिन विडंबना यह है कि उन्हें सबसे कम आराम मिल पाता है।
हार्मोनल बदलाव भी बड़ी वजह
महिलाओं की नींद केवल काम के बोझ से ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि उनके शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मासिक धर्म, गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति जैसे चरणों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन में उतार-चढ़ाव होता है, जिसका सीधा असर नींद पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार रजोनिवृत्ति के दौरान आधे से अधिक महिलाएं नींद संबंधी विकारों का सामना करती हैं। रात में बार-बार नींद टूटना, बेचैनी, घबराहट और थकान उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाते हैं। इसके बावजूद समाज अक्सर इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देता है।
रिश्तों में बढ़ रहा “नींद का अलगाव”
आधुनिक जीवनशैली ने एक नया चलन भी पैदा किया है—“स्लीप डिवोर्स” यानी नींद का अलगाव। इसमें पति-पत्नी बेहतर नींद के लिए अलग-अलग सोना पसंद कर रहे हैं।
भारत में बड़ी संख्या में दंपत्ति कभी-कभी या नियमित रूप से अलग सोते हैं ताकि एक-दूसरे की नींद प्रभावित न हो। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि अब लोग समझने लगे हैं कि अच्छी नींद केवल आराम नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरत है।
नींद की कमी: शरीर और दिमाग पर गंभीर असर
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि लगातार कम नींद लेना शरीर को भीतर से कमजोर कर देता है। इससे माइग्रेन, उच्च रक्तचाप, तनाव, अवसाद, मोटापा और हृदय रोग जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
सबसे बड़ा असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। पर्याप्त नींद न मिलने से चिड़चिड़ापन, थकान, भूलने की आदत और कार्यक्षमता में कमी आने लगती है। कई महिलाएं बीमार होने के बावजूद आराम नहीं कर पातीं क्योंकि घर और काम की जिम्मेदारियां उनका पीछा नहीं छोड़तीं।
महिलाओं की नींद को समझना होगा सामाजिक जिम्मेदारी
समाज अक्सर महिलाओं की मेहनत को “कर्तव्य” मानकर उनकी थकान को नजरअंदाज कर देता है। लेकिन अब यह समझने की जरूरत है कि यदि महिलाएं लगातार नींद और आराम से वंचित रहेंगी, तो इसका असर पूरे परिवार और समाज पर पड़ेगा।
घर के कामों में साझेदारी, कार्यस्थल पर संवेदनशील माहौल, मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत और महिलाओं को पर्याप्त आराम देना आज समय की मांग है। परिवारों को यह समझना होगा कि एक महिला मशीन नहीं है। उसे भी आराम, शांति और पूरी नींद का अधिकार है।
नींद केवल आंखें बंद करने का नाम नहीं, बल्कि शरीर और मन को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया है। जब महिलाएं अपनी नींद खो देती हैं, तो धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और जीवन की ऊर्जा भी प्रभावित होने लगती है।
आज जरूरत इस बात की है कि महिलाओं की नींद को “व्यक्तिगत कमजोरी” नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक संवेदनशीलता के मुद्दे के रूप में देखा जाए। क्योंकि एक स्वस्थ समाज की शुरुआत तभी होगी, जब उसकी महिलाएं चैन की नींद सो पाएंगी।
लेखक।। अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार

