लेखक। अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार
जब तिरंगे की छांव में सवाल खड़े हों
हर साल 26 जनवरी आती है।
सरकारी कैलेंडर में यह लाल अक्षरों वाला दिन है,
लेकिन जनता के दिलों में… अक्सर फीका।
स्कूलों की परेड, बच्चों की कविताएँ,
सरकारी कार्यालयों में झंडारोहण और औपचारिक भाषण—
यहीं तक सिमट कर रह गया है आज का गणतंत्र दिवस।
ऐसा लगता है जैसे गणतंत्र दिवस
अब जनता का नहीं,
स्कूलों और सरकारी दफ्तरों का आयोजन भर बनकर रह गया हो।
उत्सव नहीं, औपचारिकता क्यों बन गया?
आज आम आदमी के लिए गणतंत्र दिवस
देश के संविधान की जीत से ज़्यादा
एक सरकारी रस्म बनता जा रहा है।
बच्चे राष्ट्रभक्ति की पंक्तियाँ दोहराते हैं,
कर्मचारी उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर कर
अपने-अपने काम में लग जाते हैं,
और आम नागरिक टीवी पर झांकी देखकर चैनल बदल देता है।
यानी जश्न मौजूद है,
लेकिन सहभागिता ग़ायब।
कारण साफ़ हैं
महँगाई ने उत्साह की जगह चिंता दे दी
बेरोज़गारी ने सपनों से रंग छीन लिए
न्याय में देरी ने संविधान पर भरोसा कमजोर किया
राजनीतिक शोर ने राष्ट्रीय पर्व को भी थका दिया
जब जीवन की बुनियादी लड़ाई जारी हो,
तो राष्ट्रीय पर्व भी कई बार बोझ लगने लगते हैं।
संविधान की बातें, ज़मीनी सच्चाई अलग
हम संविधान की शपथ लेते हैं—
न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की।
लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि
संविधान की बातें मंचों पर होती हैं,
और उसकी आत्मा सड़क पर सवाल पूछती नज़र आती है।
न्याय सबके लिए एक-सा नहीं
समानता अब भी दूरी पर
स्वतंत्रता सवालों के घेरे में
बंधुत्व नफ़रत की राजनीति में उलझा हुआ
ऐसे में आम आदमी का मन पूछता है—
“जब गणतंत्र मेरे जीवन में दिखाई नहीं देता,
तो मैं उसे कैसे मनाऊँ?”
गणतंत्र दिवस और आम आदमी के बीच बढ़ता फासला
गणतंत्र दिवस अब लाल क़िले और राजपथ तक सीमित है,
जबकि गली-मोहल्लों में
उसकी गूंज कम होती जा रही है।
जहाँ जनता खड़ी है,
वहाँ संविधान की किताब भारी है,
लेकिन उसके अधिकार हल्के।
यही वजह है कि
तिरंगा तो लहराता है,
पर दिलों में वो जोश नहीं।
उदासीनता देशद्रोह नहीं, चेतावनी है
जनता की उदासी
देश से बेवफ़ाई नहीं,
बल्कि व्यवस्था को दी गई
एक खामोश चेतावनी है।
कि गणतंत्र को
फिर से जनता का पर्व बनाना होगा—
स्कूलों की प्रार्थना सभा से निकालकर
सड़क, खेत, कारखाने और घर तक ले जाना होगा।
जब गणतंत्र महसूस होगा, तब मनाया जाएगा
जिस दिन—
गरीब को न्याय समय पर मिलेगा
युवा को रोज़गार मिलेगा
सवाल पूछना अधिकार माना जाएगा
संविधान केवल किताब नहीं, ज़िंदगी बनेगा
उस दिन गणतंत्र दिवस
केवल आयोजन नहीं,
एक जन-उत्सव होगा।
क्योंकि गणतंत्र दिवस मनाया नहीं जाता महसूस किया जाता है।

