मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ से लेकर इंसानियत के पैगाम तक, मीलाद की रोशनी में सीरत-ए-मुस्तफा ﷺ
ईद-ए-मीलादुन्नबी मुसलमानों के लिए बेहद मुबारक और भावनात्मक अवसर है। यह वह मौका है जब दुनिया भर में बड़ी संख्या में मुसलमान पैगंबर-ए-इस्लाम, हजरत मोहम्मद ﷺ की विलादत-ए-मुबारक को याद करते हैं और उनकी पाक जिंदगी, सीरत, किरदार और इंसानियत के लिए दिए गए संदेश को अपनी जिंदगी में उतारने का संकल्प लेते हैं।
मीलादुन्नबी के मौके पर मस्जिदों, मदरसों, घरों और धार्मिक संस्थानों में कुरआन की तिलावत, दरूद-ओ-सलाम, नात-ए-पाक, महफिल-ए-मीलाद और सीरत-ए-मुस्तफा ﷺ के बयान आयोजित किए जाते हैं। कई देशों और शहरों में जुलूस-ए-मुहम्मदी भी निकाले जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोग शरीक होकर नात और दरूद-ओ-सलाम पढ़ते हैं।
आखिर ईद-ए-मीलादुन्नबी क्यों मनाई जाती है?
मीलाद का अर्थ है जन्म या पैदाइश। ईद-ए-मीलादुन्नबी के जरिए मुसलमान पैगंबर हजरत मोहम्मद ﷺ की विलादत को याद करते हैं। इस अवसर का एक प्रमुख भाव यह है कि अल्लाह का शुक्र अदा किया जाए कि उसने इंसानियत की रहनुमाई के लिए अपने आखिरी पैगंबर हजरत मोहम्मद ﷺ को दुनिया में भेजा।
हजरत मोहम्मद ﷺ की जिंदगी इंसानियत के लिए एक मुकम्मल मिसाल मानी जाती है। उन्होंने लोगों को तौहीद, सच्चाई, न्याय, रहम, अमानतदारी, भाईचारे और अच्छे अखलाक की शिक्षा दी। उन्होंने गरीबों, यतीमों, पड़ोसियों और जरूरतमंदों के अधिकारों पर जोर दिया और इंसानों के बीच भेदभाव के बजाय इंसाफ और बराबरी का संदेश दिया।
इसीलिए मीलाद के अवसर पर सिर्फ पैगंबर ﷺ की विलादत को याद नहीं किया जाता, बल्कि उनकी सीरत और शिक्षाओं को याद करके उन पर अमल करने की प्रेरणा भी ली जाती है।
मीलाद का असली संदेश क्या है?
मीलाद की खूबसूरती केवल रोशनी, सजावट, नात और जुलूस में नहीं है। इसकी असली खूबसूरती उस संदेश में है जिसे पैगंबर ﷺ ने अपनी पूरी जिंदगी के जरिए दुनिया के सामने रखा।
सच्चाई बोलना, वादा पूरा करना, पड़ोसी का ख्याल रखना, गरीब और बेसहारा की मदद करना, माता-पिता का सम्मान करना, किसी पर जुल्म न करना और समाज में अमन कायम रखना—ये वे मूल्य हैं जिन्हें मीलाद के मौके पर याद किया जाता है।
इसलिए अगर मीलाद के बाद किसी इंसान के व्यवहार में नरमी, रिश्तों में मोहब्बत, समाज में भाईचारा और जरूरतमंदों के लिए मदद का जज्बा पैदा होता है, तो यही इस अवसर की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
दुनिया के कई देशों में मनाया जाता है मीलाद
ईद-ए-मीलादुन्नबी की अभिव्यक्ति हर देश और समाज में एक जैसी नहीं है। अनेक मुस्लिम देशों और समुदायों में इसे महफिलों, धार्मिक सभाओं और सार्वजनिक आयोजनों के साथ मनाया जाता है, जबकि कुछ मुस्लिम समुदाय मीलाद को धार्मिक रूप से स्वीकार नहीं करते। इसलिए मीलाद की परंपरा दुनिया भर में विविध रूपों में दिखाई देती है।
भारत में जुलूस-ए-मुहम्मदी की परंपरा
भारत के अनेक शहरों में ईद-ए-मीलादुन्नबी के अवसर पर जुलूस-ए-मुहम्मदी निकाले जाते हैं। दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, लखनऊ, कानपुर, आगरा, बरेली, मेरठ, सहारनपुर, अजमेर, भोपाल और पटना सहित अनेक शहरों में स्थानीय स्तर पर जुलूस और महफिल-ए-मीलाद आयोजित किए जाते हैं।
जुलूसों में लोग नात-ए-पाक पढ़ते हुए, दरूद-ओ-सलाम का नजराना पेश करते हुए और पैगंबर ﷺ की सीरत को याद करते हुए शामिल होते हैं। कई स्थानों पर लंगर, शरबत और जरूरतमंदों के लिए भोजन का भी इंतजाम किया जाता है।
शहरों और मोहल्लों में घरों, मस्जिदों और धार्मिक संस्थानों को रोशनी से सजाया जाता है और पूरी रात महफिलों का सिलसिला चलता है।
पाकिस्तान में बड़े जुलूस और महफिलें
पाकिस्तान में ईद-मीलादुन्नबी को विशेष धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। कराची, लाहौर, इस्लामाबाद, रावलपिंडी, मुल्तान और फैसलाबाद सहित कई शहरों में जुलूस, महफिलें और नातिया कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
कई स्थानों पर सड़कें और इमारतें रोशनी से सजाई जाती हैं और बड़ी संख्या में लोग जुलूसों में शामिल होते हैं।
बांग्लादेश में भी धार्मिक आयोजन
बांग्लादेश में मीलादुन्नबी के अवसर पर मस्जिदों, मदरसों और धार्मिक संस्थानों में सीरत, नात और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। राजधानी ढाका समेत देश के कई हिस्सों में लोग इस अवसर पर पैगंबर ﷺ की जिंदगी और शिक्षाओं को याद करते हैं।
इंडोनेशिया में मीलाद का अलग रंग
दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देशों में शामिल इंडोनेशिया में भी मीलादुन्नबी को विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ मनाया जाता है।
कई क्षेत्रों में धार्मिक सभाएं, कुरआन की तिलावत, नात और पैगंबर ﷺ की जिंदगी पर आधारित कार्यक्रम आयोजित होते हैं। स्थानीय परंपराओं के अनुसार मीलाद का स्वरूप अलग-अलग दिखाई देता है।
यमन में विशाल आयोजन
यमन में भी मीलादुन्नबी के अवसर पर बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। राजधानी सना सहित कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग धार्मिक सभाओं और जुलूसों में शामिल होते हैं।
अफ्रीका में भी मीलाद की रौनक
मीलाद की परंपरा अफ्रीका के कई देशों में भी देखने को मिलती है। नाइजीरिया, सेनेगल, सूडान, सोमालिया, मिस्र, मोरक्को और ट्यूनीशिया सहित विभिन्न देशों में मीलाद अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
कई स्थानों पर मस्जिदों और धार्मिक संस्थानों में महफिलें आयोजित होती हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में बड़े सार्वजनिक जुलूस भी निकाले जाते हैं।
मिस्र और मोरक्को में अलग अंदाज
मिस्र में मीलाद की अपनी खास धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं। धार्मिक सभाओं के साथ इस अवसर से जुड़ी पारंपरिक मिठाइयां और बाजारों की रौनक भी देखने को मिलती है।
मोरक्को में भी मीलाद को धार्मिक महत्व प्राप्त है और विभिन्न धार्मिक संस्थानों तथा समुदायों की ओर से कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
तुर्की में ‘मेवलिद कंदिली’
तुर्की में मीलाद को ‘मेवलिद कंदिली’ के नाम से जाना जाता है। इस अवसर पर मस्जिदों में विशेष धार्मिक कार्यक्रम होते हैं और पैगंबर ﷺ की जिंदगी तथा उनके संदेश को याद किया जाता है।
जुलूस-ए-मुहम्मदी: सिर्फ जुलूस नहीं, एक पैगाम
जुलूस-ए-मुहम्मदी की असली खूबसूरती सिर्फ इसमें शामिल लोगों की संख्या या सजावट में नहीं, बल्कि उस संदेश में है जिसे यह समाज तक पहुंचाता है।
जुलूस में शामिल हर व्यक्ति अगर यह संकल्प लेकर लौटे कि वह झूठ से बचेगा, किसी पर जुल्म नहीं करेगा, गरीब की मदद करेगा, पड़ोसी का अधिकार निभाएगा और समाज में अमन और भाईचारे को मजबूत करेगा, तो जुलूस का उद्देश्य और भी सार्थक हो जाता है।
आज जब दुनिया के कई हिस्सों में नफरत, हिंसा और सामाजिक तनाव की चुनौतियां मौजूद हैं, ऐसे समय में पैगंबर ﷺ की सीरत से मिलने वाला अमन, रहमत, इंसाफ और इंसानियत का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
नई पीढ़ी को सीरत से जोड़ने का अवसर
मीलादुन्नबी नई पीढ़ी को पैगंबर ﷺ के जीवन से जोड़ने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। बच्चों और युवाओं को यह बताया जाना जरूरी है कि पैगंबर ﷺ का जीवन केवल धार्मिक इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि अच्छे इंसान बनने की एक जीवंत मिसाल है।
उनकी जिंदगी में ईमानदारी है, सब्र है, रहम है, इंसाफ है, पड़ोसी का ख्याल है, गरीबों से मोहब्बत है और इंसानियत के लिए बेहतरीन व्यवहार की शिक्षा है।
अगर नई पीढ़ी इन मूल्यों को अपने जीवन का हिस्सा बना ले, तो मीलाद का संदेश घर से लेकर समाज तक पहुंच सकता है।
मीलाद की रोशनी दिलों तक पहुंचे
ईद-ए-मीलादुन्नबी का सबसे खूबसूरत पहलू यही है कि यह इंसान को अपने भीतर झांकने का मौका देता है।
क्या हमारे व्यवहार में सच्चाई है?
क्या हम अपने पड़ोसी का अधिकार निभाते हैं?
क्या हम जरूरतमंद की मदद करते हैं?
क्या हम अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं?
क्या हम दूसरों के लिए वही चाहते हैं जो अपने लिए चाहते हैं?
अगर इन सवालों के जवाब हमारी जिंदगी को बेहतर बनाने की तरफ ले जाते हैं, तो यही मीलाद का वास्तविक संदेश है।
एक तारीख नहीं, जिंदगी बदलने का संदेश
ईद-ए-मीलादुन्नबी केवल एक दिन मनाया जाने वाला पर्व नहीं होना चाहिए। यह ऐसा अवसर है जो हमें पूरे साल पैगंबर ﷺ की सीरत पर चलने की प्रेरणा दे।
मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ दिल में हो, सीरत जिंदगी में हो और इंसानियत हमारे व्यवहार में दिखाई दे—यही ईद-ए-मीलादुन्नबी का सबसे खूबसूरत पैगाम है।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मीलाद का तरीका भले अलग हो, कहीं जुलूस निकलता है, कहीं महफिल सजती है, कहीं मस्जिदों में विशेष कार्यक्रम होते हैं और कहीं परिवारों के बीच सीरत पढ़ी जाती है—लेकिन पैगंबर ﷺ की जिंदगी से मोहब्बत, उनके अखलाक को याद करना और इंसानियत के लिए उनके संदेश को समझना इस अवसर की केंद्रीय भावना है।
सलाम उस नबी ﷺ पर, जिनकी सीरत रहमत का पैगाम है;
सलाम उस नबी ﷺ पर, जिन्होंने इंसानियत को मोहब्बत, अमन और इंसाफ का रास्ता दिखाया।
ईद-ए-मीलादुन्नबी मुबारक।
लेखक : अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार
