इस्लामी तारीख़ में 1 ज़िल-हिज्जा का दिन बेहद मुबारक, रूहानी और ऐतिहासिक अहमियत रखता है। इसी मुकद्दस दिन हज़रत अली और हज़रत सैयदा फ़ातिमा ज़हरा का मुबारक निकाह संपन्न हुआ था। यह निकाह सिर्फ दो महान हस्तियों का वैवाहिक संबंध नहीं था, बल्कि इंसानियत, सादगी, तक़वा और दीनदारी का ऐसा आदर्श था, जिसे आज भी पूरी उम्मत मोहब्बत और एहतराम के साथ याद करती है।
इस्लामी इतिहास और मशहूर रिवायतों के मुताबिक, जब हज़रत अली ने हज़रत मुहम्मद की ख़िदमत में निकाह का पैग़ाम पेश किया, तो अल्लाह के रसूल ने इस रिश्ते को पसंद फरमाया। इसके बाद 1 ज़िल-हिज्जा को निकाह की रस्म अदा हुई और स्वयं हज़रत मुहम्मद ने निकाह का खुतबा पढ़ाया। यह मुबारक दिन इस्लामी इतिहास के सबसे पाक और बरकत वाले दिनों में शुमार किया जाता है।
इस निकाह की सबसे बड़ी पहचान इसकी सादगी थी। रिवायतों के अनुसार हज़रत अली के पास अधिक धन-संपत्ति नहीं थी। पैगंबर-ए-इस्लाम के मशवरे पर उन्होंने अपनी ज़िरह (कवच) बेचकर मेहर की रकम अदा की। यह अमल आज भी उम्मत को यह पैग़ाम देता है कि निकाह को आसान और सादा बनाना इस्लाम की खूबसूरत तालीम है।
हज़रत सैयदा फ़ातिमा ज़हरा अपनी पाकीज़गी, सब्र, इबादत और अख़लाक़ की वजह से पूरी दुनिया की मुस्लिम महिलाओं के लिए आदर्श हैं, जबकि हज़रत अली इल्म, इंसाफ़, बहादुरी और तक़वा की बुलंद मिसाल माने जाते हैं। इन दोनों पाक हस्तियों का यह निकाह दरअसल ऐसे घराने की बुनियाद बना, जिसने आगे चलकर इस्लामी इतिहास को नई रौशनी दी।
निकाह के कुछ समय बाद हज़रत फ़ातिमा (स.अ.) की रुखसती हुई और यही पाक घराना आगे चलकर इमाम हसन और इमाम हुसैन जैसी महान हस्तियों का केंद्र बना। इस घराने ने दुनिया को सब्र, कुर्बानी, इंसाफ़ और दीन की हिफाज़त का ऐसा पैग़ाम दिया, जो हमेशा इंसानियत की राह रोशन करता रहेगा।
1 ज़िल-हिज्जा का यह मुबारक दिन हमें यह शिक्षा देता है कि रिश्तों की बुनियाद मोहब्बत, ईमान, सादगी और अच्छे अख़लाक़ पर होनी चाहिए। आज जब समाज में शादी-ब्याह को दिखावे और फ़िज़ूलखर्ची का माध्यम बनाया जा रहा है, तब हज़रत अली और हज़रत सैयदा फ़ातिमा ज़हरा का मुबारक निकाह पूरी इंसानियत के लिए एक बेहतरीन मिसाल है।

