बदलती शादियों के दौर में संघर्ष करती एक पारंपरिक विरासत
लेखक: अज़हर उमरी
आगरा की गलियों में कभी शादी-ब्याह के मौसम में बैंड-बाजों की गूंज दूर तक सुनाई देती थी। चमचमाती वर्दियों में सजे बैंड कलाकार, हाथों में ट्रंपेट, सैक्सोफोन, क्लैरिनेट और ढोल लिए बारात की शान हुआ करते थे। लेकिन बदलते समय के साथ यह पारंपरिक कारोबार धीरे-धीरे खामोश होता जा रहा है। आधुनिक डीजे संस्कृति, बढ़ती लागत और बदलती सामाजिक पसंद ने आगरा के बैंड उद्योग को गंभीर संकट में डाल दिया है।
एक समय था जब आगरा में सैकड़ों परिवारों की आजीविका बैंड व्यवसाय पर निर्भर थी। शहर के प्रसिद्ध बैंड घरानों की पहचान केवल आगरा तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी धुनें बॉलीवुड फिल्मों तक पहुंची थीं। विवाह समारोहों में बैंड के बिना बारात अधूरी मानी जाती थी। मगर आज अधिकांश परिवार डीजे, साउंड सिस्टम और आधुनिक लाइटिंग को प्राथमिकता देने लगे हैं, जिससे पारंपरिक बैंडों की मांग लगातार घट रही है।
बैंड मालिकों का कहना है कि पहले शादी के मौसम में लगातार बुकिंग रहती थी, जबकि अब पूरे सीजन में सीमित कार्यक्रम ही मिल पाते हैं। कई बैंड संचालकों को अपने कारोबार को बचाने के लिए डीजे और अन्य आधुनिक उपकरणों को भी शामिल करना पड़ा है। इसके बावजूद वे बड़े आयोजनों में आधुनिक मनोरंजन साधनों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं।
इस कारोबार से जुड़े कलाकारों की स्थिति और भी चिंताजनक है। अधिकांश कलाकार ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं और उन्हें अनियमित काम तथा कम मेहनताना मिलता है। कई अनुभवी कलाकारों का कहना है कि दशकों तक बैंड बजाने के बाद भी उनके पास कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं है। यही कारण है कि नई पीढ़ी इस पेशे से दूरी बना रही है और दूसरे रोजगारों की तलाश कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक व्यवसाय का संकट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के क्षरण का भी संकेत है। भारतीय शादियों की पहचान रहे पारंपरिक बैंड केवल संगीत नहीं बजाते, बल्कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सवों की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में बैंड-बाजा केवल पुरानी तस्वीरों और यादों तक सीमित होकर रह जाएगा।
हालांकि उम्मीद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कुछ बैंड संचालक आधुनिकता और परंपरा के मेल का रास्ता तलाश रहे हैं। वे पारंपरिक धुनों के साथ नए संगीत का प्रयोग कर रहे हैं और डिजिटल माध्यमों पर अपनी सेवाओं का प्रचार भी कर रहे हैं। यदि सरकार, सांस्कृतिक संस्थाएं और समाज इस विरासत के संरक्षण के लिए आगे आएं तो आगरा का यह पुराना कारोबार फिर से नई पहचान प्राप्त कर सकता है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम केवल आधुनिकता की दौड़ में अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को न भूलें। बैंड की धुनें सिर्फ संगीत नहीं हैं, बल्कि भारतीय विवाह परंपरा की आत्मा हैं। जब ये धुनें खामोश होती हैं तो केवल एक कारोबार नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों का एक हिस्सा भी धीरे-धीरे विलुप्त होने लगता है।

