लखनऊ सबसे ऊपर, अब गृह जिले के बजाय दूसरे जिलों में चलेगी सुनवाई; बार काउंसिल और सरकार को सुधार के निर्देश
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अधिवक्ता पेशे की गरिमा और न्यायिक व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेशभर में 4,157 अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज 5,056 आपराधिक मामलों पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि अब अधिवक्ताओं के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की सुनवाई उनके गृह जिले के बजाय दूसरे जिलों की अदालतों में कराई जाएगी, ताकि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने कहा कि “कानून तब दो बार मरता है, जब उसके रक्षक ही अपराध में शामिल हो जाएं और संस्थाएं उन पर कार्रवाई से बचती रहें।” अदालत ने बार काउंसिल और राज्य सरकार को अधिवक्ता पेशे की गरिमा बनाए रखने के लिए व्यापक सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 75 जिलों, सात पुलिस कमिश्नरेट और जीआरपी क्षेत्र में कुल 4,157 अधिवक्ताओं पर 5,056 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें 418 अधिवक्ता ऐसे हैं जिनके खिलाफ तीन या उससे अधिक मुकदमे दर्ज हैं।
रिपोर्ट में लखनऊ की स्थिति सबसे चिंताजनक बताई गई है। यहां 917 अधिवक्ताओं के खिलाफ 586 मुकदमे दर्ज हैं, जबकि वजीरगंज थाना अकेले ऐसा थाना है, जहां 422 अधिवक्ताओं के विरुद्ध 236 एफआईआर दर्ज हैं। हाईकोर्ट ने इसे प्रदेश का सबसे गंभीर और असामान्य आंकड़ा बताते हुए कहा कि यह न्यायालयों के आसपास अपराधी प्रवृत्ति वाले अधिवक्ताओं की बढ़ती मौजूदगी का संकेत है।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि प्रदेश में 5.14 लाख से अधिक अधिवक्ता पंजीकृत हैं, लेकिन सत्यापन के दौरान केवल 105 फर्जी डिग्रीधारी अधिवक्ताओं की पहचान होना जांच प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अदालत ने टिप्पणी की कि वर्तमान व्यवस्था महज औपचारिक प्रतीत होती है।
अदालत ने भविष्य के लिए कई अहम सुझाव भी दिए हैं। इनमें नामांकन से पहले अनिवार्य पुलिस सत्यापन, विश्वविद्यालयों, नेशनल एकेडमिक डिपॉजिटरी (NAD) और डिजीलॉकर के माध्यम से डिग्रियों का डिजिटल सत्यापन, प्रत्येक अधिवक्ता से वार्षिक शपथपत्र तथा स्वतंत्र अनुशासनात्मक ट्रिब्यूनल का गठन शामिल है।
साथ ही हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि स्थानांतरित मामलों का आवंटन संबंधित जिला जज करेंगे। पुलिस सभी केस डायरी, चार्जशीट और अन्य अभिलेख समय पर स्थानांतरित अदालत को उपलब्ध कराएगी। गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी तथा आरोपितों को व्यक्तिगत उपस्थिति से सामान्य रूप से छूट नहीं मिलेगी। अनावश्यक अनुपस्थिति की स्थिति में जमानत निरस्त करने तक की कार्रवाई की जा सकती है।
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल लखनऊ या किसी एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था और अधिवक्ता पेशे की पारदर्शिता व विश्वसनीयता को लेकर एक महत्वपूर्ण और व्यापक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

