आगरा: ताजमहल को ‘तेजोमहालय’ बताने वाली विवादित फिल्म ‘द ताज स्टोरी’ की रिलीज से ठीक एक दिन पहले, आगरा का माहौल गरम है। अखिल भारत हिंदू महासभा ने इस फिल्म को केवल मनोरंजन नहीं बल्कि एक वैचारिक संदेश के माध्यम के रूप में प्रस्तुत करने का ऐलान किया है।
संगठन ने मेहर सिनेमा हॉल और संजय टॉकीज में पहले शो के लिए 100 मुफ्त टिकट देने की घोषणा की है। इसके साथ ही दर्शकों को कोल्ड ड्रिंक और चिप्स भी दिए जाएंगे और उनके आने-जाने का खर्चा भी महासभा उठाएगी। इसके लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया है, ताकि इच्छुक दर्शक संपर्क कर सकें।
महासभा ने फिल्म को टैक्स फ्री कराने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ज्ञापन सौंपा है। जिला अध्यक्ष मीरा राठौर ने कहा कि यह फिल्म “तेजोमहालय की सच्चाई” सामने लाएगी। संजय जाट ने विवादित बयानों में कहा कि इतिहास के नए नजरिए को दिखाने वाले लोग ही इसे विवादित मानते हैं।
सिनेमा और वैचारिक संदेश:
फिल्म को टैक्स फ्री कराने और मुफ्त दर्शक जुटाने की कवायद यह दर्शाती है कि उद्देश्य केवल टिकट बेचना नहीं, बल्कि एक खास ‘इतिहास की सच्चाई’ को जनता के बीच स्थापित करना है। सिनेमा को मनोरंजन से अधिक, वैचारिक संदेश फैलाने का मंच बनाया गया है।
विवाद को जीवित रखना:
संजय जाट का बयान, जिसमें उन्होंने ‘तेजोमहालय तुड़वाने’ तक की बात कही, यह संकेत देता है कि संगठन का उद्देश्य विवाद को चरम पर ले जाना है, न कि समाधान करना। वैज्ञानिक या न्यायिक साक्ष्यों को दरकिनार कर भावनात्मक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना प्रमुख रणनीति प्रतीत होती है।
प्रचार और फंडिंग:
100 मुफ्त टिकट, कोल्ड ड्रिंक, चिप्स और आने-जाने का खर्च— यह महत्वपूर्ण आर्थिक निवेश है। सवाल यह है कि इस प्रचार की फंडिंग कहां से आ रही है। देश में आर्थिक असमानता के बीच इस तरह का खर्च दर्शाता है कि यह आंदोलन जमीन से कम और किसी बड़े तंत्र द्वारा प्रायोजित अधिक प्रतीत होता है।
मनोरंजन या इतिहास की री-राइटिंग:
देश की पुरातात्विक संस्था (ASI) और सुप्रीम कोर्ट ने ताजमहल की पहचान और याचिकाओं को बार-बार स्पष्ट किया है। इसके बावजूद मुफ्त टिकट और सिनेमाई माध्यम के जरिए नया नैरेटिव स्थापित करने की कोशिश, इतिहास के सत्यापन और अकादमिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करती है।
फिल्म ‘द ताज स्टोरी’ की रिलीज से पहले अखिल भारत हिंदू महासभा का यह कदम केवल टिकट वितरण नहीं है। यह एक राजनीतिक और वैचारिक प्रचार है, जो शोध और अकादमिक साक्ष्यों को भावनात्मक अपील और लोकप्रिय माध्यम से चुनौती देता है।
यह घटना बताती है कि सिनेमा ज्ञान और सत्य की तलाश की जगह वैचारिक खेमेबंदी का माध्यम बन सकता है। ऐसे प्रयास समाज के लिए चिंताजनक हैं, जहां जनता साक्ष्य आधारित विमर्श पर विश्वास करती है।

