अकबर और जहांगीर के शासनकाल में शाही दरबार तक पहुंचा दीपोत्सव, शाहजहां के दौर में भी जारी रहीं उत्सव की परंपराएं; मुगलकालीन इतिहास में दर्ज हैं हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक मेलजोल के कई दिलचस्प प्रसंग
लेखक – अज़हर उमरी, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
हिन्दुस्तान का इतिहास केवल बादशाहों की सल्तनत, युद्धों और सत्ता परिवर्तन की कहानियों तक सीमित नहीं है। इस देश का इतिहास उन सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का भी गवाह है, जिन्होंने अलग-अलग धर्मों, समुदायों और संस्कृतियों को एक-दूसरे के करीब लाने का काम किया। दीपावली भी ऐसा ही एक पर्व है, जिसकी रोशनी ने इतिहास के विभिन्न दौरों में भारतीय समाज के साथ-साथ शाही महलों और दरबारों तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या मुगल बादशाह भी दीपावली मनाते थे? क्या आगरा के किले और दिल्ली के लाल किले में भी दीपावली के अवसर पर दीये जलाए जाते थे? क्या मुगल दरबार में आतिशबाजी, रोशनी और उत्सव का आयोजन होता था?
ऐतिहासिक विवरणों, मुगलकालीन संस्मरणों, चित्रकलाओं और इतिहासकारों के लेखों से पता चलता है कि विशेष रूप से अकबर, जहांगीर और शाहजहां के दौर में दीपावली तथा दूसरे भारतीय त्योहारों को शाही संस्कृति में स्थान मिला था। हालांकि अलग-अलग बादशाहों के शासनकाल में इन परंपराओं का स्वरूप एक जैसा नहीं रहा।
अकबर: शाही दरबार में दीपावली को मिली जगह
मुगल साम्राज्य के तीसरे बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर (1556-1605) का शासन भारतीय इतिहास में धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय की नीतियों के लिए जाना जाता है।
अकबर ने अपने शासनकाल में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों को प्रशासन तथा शाही दरबार में महत्वपूर्ण स्थान दिया। उसके दरबार में राजपूत राजाओं और हिन्दू अधिकारियों की भागीदारी रही। भारतीय त्योहारों और रीति-रिवाजों के प्रति भी शाही संस्कृति में रुचि दिखाई देती थी।
इतिहासकार अबुल फजल की प्रसिद्ध पुस्तक ‘आइन-ए-अकबरी’ में भारतीय त्योहारों का उल्लेख मिलता है। इसमें दीपावली की तुलना इस्लामी परंपरा के शब-ए-बरात से की गई है। यह उल्लेख बताता है कि उस दौर के शाही बौद्धिक और सांस्कृतिक वातावरण में दीपावली एक परिचित उत्सव थी।
आगरा किले से जुड़ी ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार अकबर के समय दीपावली पर विशेष रोशनी और उत्सव आयोजित किए जाते थे। कुछ विवरणों में गौपूजा और जरूरतमंदों को दान देने का भी उल्लेख मिलता है।
जहांगीर: दीपों और उत्सवों का सिलसिला
अकबर के पुत्र और उत्तराधिकारी नूरुद्दीन मोहम्मद जहांगीर (1605-1627) के शासनकाल में भी भारतीय त्योहारों के प्रति शाही दरबार की रुचि दिखाई देती है।
जहांगीर की आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहांगीरी’ मुगलकालीन जीवन, दरबारी संस्कृति और बादशाह के व्यक्तिगत अनुभवों का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज है।
इतिहासकार रुचिका शर्मा ने अपने शोधपरक लेख में जहांगीर के संस्मरणों के हवाले से दीपावली के उत्सव, मित्रों से मुलाकात और उस दिन की सामाजिक परंपराओं का उल्लेख किया है।
आगरा से जुड़ी एक प्रकाशित रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जहांगीर के दौर में 1613 से 1623 के बीच दीपावली की रोशनी के लिए मशालों का इस्तेमाल किया गया था। इस तरह दीपोत्सव शाही संस्कृति का हिस्सा बना रहा।
शाहजहां: आगरा किले की रोशनी और शाही उत्सव
मुगल बादशाह शाहजहां (1628-1658) के शासनकाल में भी दीपावली से जुड़ी उत्सवी परंपराओं के उल्लेख मिलते हैं।
आगरा किले को मुगल स्थापत्य का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार दीपावली के अवसर पर किले में दीपक जलाए जाते थे और आतिशबाजी का आयोजन होता था।
किले के सामने स्थित खुले मैदान में आतिशबाजी देखने के लिए लोगों की भीड़ जुटती थी। आगरा के ऐतिहासिक विवरणों में दशहरे से शुरू होकर दीपावली तक चलने वाले रोशनी के उत्सव का उल्लेख मिलता है, जिसे जश्न-ए-चरागां कहा जाता है।
इस आयोजन में किले की इमारतों को रोशन करने और जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा का भी वर्णन किया गया है।
दारा शिकोह: धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय की सोच
शाहजहां के बड़े पुत्र दारा शिकोह भारतीय दर्शन, सूफी विचारधारा और विभिन्न धर्मों के बीच आध्यात्मिक समानताओं को समझने में विशेष रुचि रखते थे।
उन्होंने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराया और हिन्दू तथा इस्लामी आध्यात्मिक परंपराओं के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास किया।
आगरा की दीपावली परंपराओं से जुड़े कुछ ऐतिहासिक विवरणों में दारा शिकोह के दीपोत्सव में शामिल होने और हाथी पर सवार होकर शहर की रोशनी देखने निकलने का उल्लेख भी मिलता है।
दारा शिकोह का जीवन इस बात का उदाहरण है कि मध्यकालीन भारत में ऐसे शासक और राजपरिवार के सदस्य भी हुए, जिन्होंने विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं के बीच संवाद को महत्व दिया।
औरंगजेब का दौर: इतिहास का एक अलग अध्याय
मुगल इतिहास की चर्चा औरंगजेब के शासनकाल के बिना पूरी नहीं हो सकती। औरंगजेब (1658-1707) की धार्मिक और प्रशासनिक नीतियां अपने पूर्ववर्ती कुछ मुगल बादशाहों से अलग थीं।
ऐतिहासिक दस्तावेजों में उसके शासनकाल के दौरान कुछ क्षेत्रों में दीपावली की सार्वजनिक रोशनी और आतिशबाजी पर रोक लगाने के आदेशों का उल्लेख मिलता है।
इतिहासकारों द्वारा उद्धृत मुगलकालीन प्रशासनिक अभिलेखों के अनुसार, 1665 में गुजरात के अहमदाबाद में दीपावली के अवसर पर बाजारों में रोशनी न करने का आदेश दिया गया था। वर्ष 1667 में आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगाने का आदेश भी दर्ज है।
हालांकि इन आदेशों को पूरे भारत में दीपावली के पूर्ण प्रतिबंध के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। मुगल साम्राज्य विशाल था और अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय परंपराएं जारी रहीं।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मुगलकालीन इतिहास को केवल एक रंग में नहीं देखा जा सकता। अलग-अलग बादशाहों की नीतियों और उनके शासनकाल की परिस्थितियों को समझना जरूरी है।
लाल किले से लखनऊ तक: मुगलकालीन चित्रकला में दीपावली
मुगल और उत्तर-मुगलकालीन चित्रकलाएं उस समय के सामाजिक जीवन और उत्सवों की महत्वपूर्ण झलक प्रस्तुत करती हैं।
अठारहवीं शताब्दी की एक प्रसिद्ध चित्रकला में शाही महिलाओं को दीपावली मनाते हुए दिखाया गया है। अमेरिका के क्लीवलैंड म्यूजियम ऑफ आर्ट में संरक्षित लगभग 1760 की चित्रकला में महल के आंगन, नावों और आसपास के वातावरण को दीपों से रोशन दिखाया गया है। महिलाएं आतिशबाजी और फुलझड़ियों के साथ उत्सव मनाती नजर आती हैं।
इसी तरह मुहम्मद शाह रंगीला के दौर से जुड़ी चित्रकलाओं और ऐतिहासिक विवरणों में भी शाही परिवार के दीपावली उत्सवों की झलक मिलती है।
यह चित्रकलाएं बताती हैं कि मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के बाद भी उत्तर भारत के शाही और सांस्कृतिक परिवेश में दीपावली का उत्सव महत्वपूर्ण बना रहा।
आगरा की ऐतिहासिक विरासत और आज का संदेश
आगरा केवल ताजमहल, आगरा किले और फतेहपुर सीकरी के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह शहर हिन्दुस्तान की साझा सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
यहां मुगलकालीन स्थापत्य, राजपूत परंपराएं, सूफी संस्कृति और विभिन्न समुदायों के सामाजिक संबंधों ने मिलकर एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाई।
आगरा किले में दीपावली से जुड़े ऐतिहासिक विवरण इस शहर की सांस्कृतिक विविधता को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर देते हैं।
आज आवश्यकता है कि इतिहास को राजनीतिक या धार्मिक चश्मे से देखने के बजाय प्रमाणों और ऐतिहासिक परिस्थितियों के आधार पर समझा जाए। अकबर के दौर की सांस्कृतिक भागीदारी, जहांगीर के संस्मरण, शाहजहां के समय की परंपराएं और औरंगजेब के दौर के प्रतिबंधात्मक आदेश—इन सभी को एक साथ पढ़ने से ही मुगलकालीन भारत की वास्तविक तस्वीर सामने आती है।
इतिहास की रोशनी में वर्तमान का रास्ता
मुगलकालीन दीपावली की कहानी हमें यह समझने का अवसर देती है कि भारत की संस्कृति सदियों से अनेक परंपराओं के मेलजोल से विकसित हुई है।
त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं होते, वे समाज के लोगों को मिलने, खुशियां साझा करने और आपसी रिश्तों को मजबूत करने का अवसर भी देते हैं।
आज जब समाज को संवाद, सद्भाव और आपसी विश्वास की जरूरत है, तब इतिहास के इन प्रसंगों को याद करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
दीपावली के दीपक हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देते हैं। सूफी संतों की शिक्षाएं भी दिलों से नफरत मिटाकर मोहब्बत की रोशनी फैलाने की प्रेरणा देती हैं।
हिन्दुस्तान की असली पहचान उसकी विविधता, साझा विरासत और आपसी सम्मान में है। इतिहास के पन्नों में दर्ज दीपावली के ये प्रसंग हमें याद दिलाते हैं कि इस मुल्क की संस्कृति किसी एक दौर, धर्म या समुदाय की नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की साझा धरोहर है जिन्होंने सदियों से इसे बनाया और संवारा है।
— अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
TIMES OF TAJ डिस्क्लेमर: यह लेख ऐतिहासिक विवरणों एवं लेखक के विश्लेषण पर आधारित है। इससे संस्थान की सहमति अनिवार्य रूप से प्रतिबिंबित नहीं होती।
