लेखिका – बेगम तबस्सुम
(शिक्षिका और सामाजिक चिंतक )
माँ-बाप अगर एक ही बात सौ बार भी कहें, तो उसे हर बार उसी ध्यान और सम्मान के साथ सुनना चाहिए जैसे वह पहली बार कही जा रही हो। यह केवल एक सीख नहीं, बल्कि हमारे संस्कार और व्यक्तित्व की पहचान है।
आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में अक्सर युवा यह महसूस करते हैं कि माता-पिता बार-बार एक ही बात दोहराते हैं—कभी पढ़ाई को लेकर, कभी आदतों को लेकर, तो कभी जीवन के छोटे-छोटे नियमों को लेकर। कई बार यह दोहराव उन्हें खटकता है, लेकिन अगर हम गहराई से सोचें, तो यही बातें उनके अनुभव और हमारे प्रति उनकी चिंता का आईना होती हैं।
माँ-बाप का हर शब्द उनकी जिंदगी के अनुभवों से निकला होता है। उन्होंने जिन हालातों का सामना किया होता है, वही उन्हें बार-बार हमें समझाने के लिए प्रेरित करता है। वे चाहते हैं कि हम उन गलतियों से बचें, जिनसे वे खुद गुजरे हैं या जिन्हें उन्होंने अपने आसपास होते देखा है।
जब हम उनकी बातों को ध्यान से सुनते हैं, तो न केवल हम उनके अनुभव से सीखते हैं, बल्कि उनके दिल को भी सुकून मिलता है। उन्हें यह एहसास होता है कि उनकी परवरिश और उनकी सीख हमारे जीवन में मायने रखती है।
असल में सुनना सिर्फ शब्दों को सुनना नहीं होता, बल्कि उस भावना को समझना होता है जो उन शब्दों के पीछे होती है—प्यार, चिंता और हमारी खुशियों की कामना।
अंत में यही कहा जा सकता है कि माँ-बाप की बातें कभी पुरानी नहीं होतीं, बल्कि हर बार नई सीख देकर जाती हैं। इसलिए जब भी वे कुछ कहें—चाहे कितनी ही बार क्यों न कहें—उसे पूरे दिल से सुनिए, क्योंकि वही बातें आपके जीवन की सबसे मजबूत नींव बनती हैं।

