लेखिका – सना उमरी
बाल मनोचिकित्सक
एफ़ एच मेडिकल कॉलेज एत्मादपुर आगरा
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है। छोटे-छोटे बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन पर वीडियो देखते, गेम खेलते या सोशल मीडिया का उपयोग करते नजर आते हैं। व्यस्त जीवनशैली के कारण कई अभिभावक बच्चों को शांत रखने या व्यस्त रखने के लिए उनके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदत बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर गंभीर असर डाल रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक मोबाइल स्क्रीन देखने से बच्चों की एकाग्रता क्षमता कमजोर होती है। लगातार बदलती तस्वीरें और तेज आवाजें उनके मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं, जिससे पढ़ाई में ध्यान लगाने की क्षमता कम हो जाती है। कई बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेलापन और व्यवहार में बदलाव जैसी समस्याएं भी देखने को मिल रही हैं।
मोबाइल की लत बच्चों की नींद पर भी असर डालती है। देर रात तक स्क्रीन देखने से उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती, जिसका सीधा प्रभाव मानसिक विकास और स्मरण शक्ति पर पड़ता है। इसके अलावा आंखों की कमजोरी, सिरदर्द और शारीरिक निष्क्रियता जैसी समस्याएं भी तेजी से बढ़ रही हैं।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बचपन सीखने, खेलने और सामाजिक संबंध विकसित करने का समय होता है। यदि बच्चे अधिक समय मोबाइल पर बिताते हैं तो उनका संवाद कौशल और रचनात्मक सोच प्रभावित होती है। वे परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने के बजाय आभासी दुनिया में खोने लगते हैं।
अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के मोबाइल उपयोग की समय सीमा तय करें और उन्हें खेलकूद, किताबें पढ़ने, चित्रकारी, कहानी सुनने तथा रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करें। घर में ऐसा वातावरण बनाया जाए जहां बच्चे परिवार के साथ अधिक समय बिताएं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते बच्चों को मोबाइल की लत से नहीं बचाया गया तो आने वाले समय में यह समस्या उनके मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तित्व विकास के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। इसलिए जरूरी है कि तकनीक का उपयोग संतुलित और नियंत्रित तरीके से किया जाए, ताकि बच्चे स्वस्थ, रचनात्मक और आत्मविश्वासी बन सकें।

