लेखक। अज़हर उमरी
रक्त की कमी के कारण हर दिन देश में हज़ारों मरीज़ों की जान जोखिम में पड़ जाती है। सड़क हादसे, गंभीर ऑपरेशन, थैलेसीमिया, कैंसर और प्रसव जैसी स्थितियों में रक्त की तत्काल आवश्यकता होती है। ऐसे में रक्तदान केवल एक चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं, बल्कि इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा है। इस्लाम भी मानव जीवन की रक्षा को सर्वोच्च इबादत मानता है।
क़ुरआन का पैग़ाम: जान बचाना सबसे बड़ा नेक अमल
क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
“जिसने एक जान को बचाया, उसने मानो पूरी मानवता को बचाया।”
(सूरह अल-माइदा: 32)
उलेमा-ए-किराम के अनुसार रक्तदान इस आयत की जीवंत मिसाल है, क्योंकि इसके ज़रिये किसी ज़रूरतमंद को जीवनदान मिलता है।
हदीस में इंसानियत की सेवा पर ज़ोर
हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया:
“सबसे बेहतर इंसान वह है जो लोगों के लिए सबसे अधिक लाभकारी हो।”
(अल-मुअजम अल-अवसत)
रक्तदान ऐसा अमल है, जिससे सीधे तौर पर किसी की जान बचाई जा सकती है, इसलिए इसे बेहतरीन सदक़ा माना गया है।
क्या इस्लाम में रक्तदान जायज़ है?
धार्मिक विद्वानों की सर्वसम्मत राय है कि:
रक्तदान पूरी तरह जायज़ है
यह सवाब और सदक़ा का काम है
शर्त सिर्फ़ इतनी है कि दान करने वाले को स्वयं कोई गंभीर नुकसान न हो
चिकित्सा विशेषज्ञों का भी कहना है कि स्वस्थ व्यक्ति द्वारा सीमित मात्रा में रक्तदान सुरक्षित होता है।
मज़हब से ऊपर इंसानियत
इस्लाम इंसान की जान को धर्म और जाति से ऊपर रखता है। इसलिए किसी गैर-मुस्लिम को रक्त देना भी पूरी तरह जायज़ और पुण्य का कार्य है। यह इस्लाम की सार्वभौमिक मानवतावादी सोच को दर्शाता है।
समाज से अपील
धार्मिक और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि मुस्लिम युवा नियमित रूप से रक्तदान करें, तो अस्पतालों में खून की कमी जैसी समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है। मस्जिदों, मदरसों और सामाजिक मंचों से रक्तदान जागरूकता अभियान चलाने की ज़रूरत है।
रक्तदान इस्लाम की मूल भावना—रहमत, मदद और जीवन-रक्षा—का प्रतीक है। यह केवल सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि एक ऐसी इबादत है जिसका सवाब दुनिया और आख़िरत दोनों में मिलता है।
Times of TAJ सभी नागरिकों से अपील करता है कि आगे आएँ, रक्तदान करें और किसी ज़रूरतमंद की ज़िंदगी को नया सवेरा दें।

