लेखक। अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार
पुण्यतिथि (8 जून) पर विशेष
भारतीय रंगमंच के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल कलाकार नहीं, बल्कि एक युग का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने भारतीय रंगमंच को नई दृष्टि, नई भाषा और नई पहचान दी। 8 जून 2009 को उनके निधन के साथ भारतीय थिएटर का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन उनकी कला, विचार और प्रयोग आज भी जीवित हैं।
रंगमंच को जनता से जोड़ने वाले कलाकार
1 सितंबर 1923 को रायपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) में जन्मे हबीब तनवीर का वास्तविक नाम हबीब अहमद खान था। वे नाटककार, निर्देशक, अभिनेता, कवि और सांस्कृतिक चिंतक थे। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा रंगमंच को समर्पित किया और भारतीय लोक कलाओं को आधुनिक थिएटर की मुख्यधारा में स्थापित किया।
हबीब तनवीर का मानना था कि असली थिएटर गांवों में बसता है। उन्होंने शहरों के शिक्षित दर्शकों को गांवों की जीवंत संस्कृति, लोकभाषा और लोककलाओं से परिचित कराया। यही कारण है कि उनके नाटक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज बन गए।
‘नया थिएटर’ की स्थापना और नई रंगभाषा
सन् 1959 में उन्होंने की स्थापना की। यह केवल एक रंगमंचीय संस्था नहीं थी, बल्कि भारतीय थिएटर में एक सांस्कृतिक आंदोलन थी। उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को मंच पर लाकर आधुनिक रंगमंच के साथ जोड़ा और लोकनाट्य ‘नाचा’ की शैली को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
उनके प्रयोगों ने यह साबित किया कि भारतीय लोक परंपराएं आधुनिक रंगमंच की सबसे बड़ी ताकत बन सकती हैं। उन्होंने पश्चिमी रंगशास्त्र और भारतीय लोक तत्वों का ऐसा संगम किया जिसने एक नई रंगभाषा को जन्म दिया।
कालजयी नाटक और अमर कृतियां
हबीब तनवीर के नाटक आज भी रंगमंच की पाठशाला माने जाते हैं। उनके प्रमुख नाटकों में , , “गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद”, “मिट्टी की गाड़ी”, “जिन लाहौर नहीं देख्या” और “ज़हरीली हवा” विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
विशेष रूप से “चरनदास चोर” ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। यह नाटक भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है और इसे विश्व के अनेक मंचों पर प्रस्तुत किया गया।
सम्मान और उपलब्धियां
भारतीय कला और संस्कृति में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें पुरस्कार, पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे।
रंगमंच का विद्रोही और जनपक्षधर चेहरा
हबीब तनवीर केवल नाटककार नहीं थे, बल्कि समाज की विसंगतियों पर सवाल उठाने वाले चिंतक भी थे। उनके नाटकों में आम आदमी, किसान, मजदूर और हाशिए के समाज की आवाज़ सुनाई देती है। उन्होंने रंगमंच को सत्ता के मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के संवाद का मंच बनाया।
आज भी जीवित है उनकी विरासत
8 जून 2009 को भोपाल में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी बनाई रंगपरंपरा आज भी जीवित है। नया थिएटर और उनके शिष्यों की पीढ़ियां उनके विचारों को आगे बढ़ा रही हैं। भारतीय रंगमंच में जब भी लोक संस्कृति, जनसरोकार और रचनात्मक प्रयोगों की चर्चा होगी, हबीब तनवीर का नाम आदरपूर्वक लिया जाएगा।
हबीब तनवीर ने भारतीय रंगमंच को केवल नए नाटक नहीं दिए, बल्कि उसे भारतीय मिट्टी की खुशबू, लोकजीवन की संवेदना और जनमानस की आत्मा से जोड़ दिया। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक कलाकार को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक दृष्टि को नमन करना है जिसने भारत की लोक परंपराओं को विश्व मंच पर सम्मान दिलाया।
“हबीब तनवीर चले गए, लेकिन उनके पात्र, उनके संवाद और उनका रंगमंच आज भी भारतीय संस्कृति की धड़कनों में जीवित हैं।”

