इस्लामी तारीख़ में कुछ शख़्सियतें ऐसी हैं जिनका ज़िक्र सिर्फ़ मज़हबी दायरे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनका किरदार पूरी इंसानियत के लिए रहनुमा बन जाता है। हज़रत अली बिन अबी तालिब (कर्म अल्लाहु वज्हहू) ऐसी ही एक अज़ीम हस्ती हैं, जिनकी ज़िंदगी इंसाफ़, बहादुरी, इल्म, सच्चाई और इंसान-दोस्ती की मिसाल है।
हज़रत अली का जन्म काबा शरीफ़ के अंदर हुआ—यह शरफ़ और फ़ज़ीलत किसी और को हासिल नहीं। यही वजह है कि आपको “काबा में जन्मा इंसाफ़ का सूरज” कहा जाता है। आपने बचपन से ही रसूल-ए-अकरम ﷺ की सरपरस्ती में परवरिश पाई और सबसे पहले इस्लाम क़बूल करने वालों में शामिल हुए।
इल्म का दरवाज़ा
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“मैं इल्म का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा हैं।”
यह हदीस हज़रत अली की इल्मी महानता को बयान करने के लिए काफ़ी है। क़ुरआन की तफ़सीर हो, फ़िक़्ही मसाइल हों या इंसाफ़ के उसूल—हर मैदान में हज़रत अली बेमिसाल नज़र आते हैं। उनका फ़रमान था:
“इंसान दो तरह के होते हैं—या तो दीन में तुम्हारे भाई, या इंसानियत में तुम्हारे बराबर।”
यह जुमला आज के दौर में इंसानियत का सबसे बड़ा पैग़ाम है।
बहादुरी और इंसाफ़
जंग-ए-बद्र, उहुद, ख़ंदक और ख़ैबर—हर मोर्चे पर हज़रत अली की शुजाअत ने इस्लाम को मजबूती दी। मगर उनकी बहादुरी सिर्फ़ तलवार तक सीमित नहीं थी; वह इंसाफ़ के मैदान में भी उतनी ही मज़बूत थी। ख़लीफ़ा होने के बावजूद आम आदमी की तरह अदालत में पेश होना, ग़रीबों और मज़लूमों का हक़ दिलाना—यह उनके किरदार की बुलंदी है।
आज के दौर के लिए पैग़ाम
आज जब दुनिया नफ़रत, ज़ुल्म और फ़र्क़ापरस्ती से जूझ रही है, हज़रत अली की तालीमात हमें इंसाफ़, सब्र और भाईचारे का रास्ता दिखाती हैं। अगर हम उनकी ज़िंदगी से सीख लें—तो समाज में अमन, बराबरी और इंसानियत दोबारा ज़िंदा हो सकती है।
हज़रत अली सिर्फ़ एक ऐतिहासिक शख़्सियत नहीं, बल्कि एक ज़िंदा किरदार हैं—जो हर दौर को राह दिखाते रहेंगे।

लेखक – इंजिनियर मुहम्मद आदिल
प्रदेश अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश
ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड (यूथ)

