इस्लाम को अगर सही अर्थों में समझा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह धर्म इल्म, इंसाफ़ और बराबरी का पैरोकार है। इस्लामी इतिहास में हज़रत अली बिन अबी तालिब (कर्म अल्लाहु वज्हहू) का व्यक्तित्व न सिर्फ़ बहादुरी और न्याय का प्रतीक है, बल्कि वह शिक्षा—विशेषकर स्त्री शिक्षा—के मज़बूत समर्थक भी थे।
हज़रत अली का स्पष्ट संदेश था कि इल्म किसी एक वर्ग या लिंग की विरासत नहीं, बल्कि यह हर इंसान का अधिकार है। उनके अनुसार, शिक्षित महिला केवल अपने परिवार को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को सही दिशा देती है।
इल्म: स्त्री और पुरुष दोनों के लिए
हज़रत अली फ़रमाते हैं:
“इल्म दौलत से बेहतर है, क्योंकि इल्म तुम्हारी हिफ़ाज़त करता है, जबकि दौलत की हिफ़ाज़त तुम्हें करनी पड़ती है।”
यह कथन स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है। उन्होंने कभी यह भेद नहीं किया कि ज्ञान सिर्फ़ पुरुषों के लिए है। बल्कि, उनके घर की महिलाएँ—विशेष रूप से हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (र.अ.)—ज्ञान, समझ और चरित्र की उच्च मिसाल थीं।
शिक्षित नारी: संस्कारों की पहली पाठशाला
हज़रत अली मानते थे कि माँ बच्चे की पहली शिक्षक होती है। यदि माँ शिक्षित, जागरूक और विवेकशील होगी, तो आने वाली पीढ़ी भी संस्कारी, नैतिक और समाजोपयोगी बनेगी। इसीलिए स्त्री शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और सामाजिक निर्माण का आधार है।
आज के दौर में हज़रत अली का संदेश
आज जब कई समाजों में लड़कियों की शिक्षा को अब भी बोझ या परंपरा के विरुद्ध समझा जाता है, तब हज़रत अली की शिक्षाएँ हमें झकझोरती हैं। उनका जीवन यह सिखाता है कि:
- शिक्षित स्त्री, आत्मनिर्भर स्त्री होती है
- आत्मनिर्भर स्त्री, अन्याय के विरुद्ध खड़ी होती है
- और ऐसी स्त्री, पूरे समाज को मज़बूत बनाती है
निष्कर्ष
हज़रत अली का चिंतन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यदि हम वास्तव में एक न्यायपूर्ण, सभ्य और प्रगतिशील समाज चाहते हैं, तो हमें स्त्री शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। यही हज़रत अली का अमर संदेश है—इल्म से इंसान ऊँचा उठता है, और स्त्री शिक्षित होकर पूरी मानवता को ऊँचाई देती है।
✦ लेखक – तबस्सुम अब्बास
सामाजिक चिंतक और शिक्षिका

