नई दिल्ली, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्कृत विभाग एवं अन्ताराष्ट्रिय संस्कृत अध्ययन समवाय, पेरिस (International Association of Sanskrit Studies, Peris) के संयुक्त तत्वावधान में समायोजित अन्ताराष्ट्रिय पञ्चव्याख्यानमाला (Five lecture series) के अंतर्गत दिनाङ्क 16 अप्रैल 2026 को एफटीके-सीआईटी सभागार में ‘संस्कृत और संगीतशास्त्र’ विषयक समापन व्याख्यान का भव्य आयोजन किया गया। यह व्याख्यान जामिया मिल्लिया इस्लामिया के माननीय कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ़ की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में मोहिनीअट्टम की प्रख्यात नृत्याङ्गना तथा दिल्ली विश्वविद्यालय की सङ्गीत एवं ललितकला संकाय की पूर्व सङ्कायाध्यक्षा प्रो. दीप्ति ओमचेरी भल्ला एवं प्रो. इक्तिदार मो. खान, सङ्कायाध्यक्ष, मानविकी एवं भाषा की गरिमामयी उपस्थिति रही।
अभ्यागत अतिथियों का वाचिक स्वागत करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. जयप्रकाश नारायण ने बतलाया कि इस व्याख्यानमाला के आयोजन का उद्देश्य संस्कृत और अन्य विषयों के अन्तःसम्बन्ध को रेखाङ्कित करना तथा छात्रों को संस्कृत के साथ अन्तर्विषयक अध्ययन की ओर उन्मुख कराना था। इस व्याख्यानमाला के अन्तर्गत संस्कृत एवं अन्य विषयों के साथ अन्तःसम्बन्धात्मक 5 व्याख्यानों का आयोजन किया गया। आज के व्याख्यान का उद्देश्य संस्कृत एवं सङ्गीतशास्त्र के सम्बन्ध को रेखाङ्कित करते हुए अभिनयात्मक प्रस्तुति द्वारा छात्रों को सङ्गीतशास्त्र के प्रमुख तत्वों से परिचित कराना है।

प्रो. दीप्ति ओमचेरी भल्ला ने बतलाया कि सङ्गीतशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रन्थ सङ्गीतरत्नाकर में गीत (गायन), वाद्य (वादन) एवं नृत्य के समन्वय को सङ्गीत कहा गया है- ‘गीतं वाद्यं च नृत्यञ्च त्रयं सङ्गीतमुच्यते’। उन्होंने सङ्गीत से सम्बन्धित भरतमुनि, शारङ्गदेव एवं नारद के ग्रन्थों में निहित सङ्गीतविषयक प्रमुख तत्त्वों का विस्तार से विवेचन करते हुए नाट्यशास्त्र में वर्णित सङ्गीत की देशी एवं मार्गी धाराओं की अभिनयात्मक प्रस्तुति द्वारा सङ्गीत के मर्म का रहस्योद्घाटन किया। उन्होंने बतलाया कि जब तक किसी भी सङ्गीत में सुर, ताल एवं लय में समञ्जस्य स्थापित नहीं होता तब तक वह सङ्गीत श्रोताओं को आकर्षित नहीं करता है। इस अवसर पर उन्होंने छात्रों को अपनी सङ्गीत की परम्परा के प्रति सचेष्ट रहने हेतु प्रेरित भी किया।

प्रो. इक्तेदार मोहम्मद खान ने अपने उद्बोधन में कहा कि शास्त्रों के द्वारा जो शिक्षा हमें दी जाती है उसका व्यवहारिक जीवन में किस प्रकार से प्रयोग किया जाए वह हमें संस्कृत एवं सङ्गीत की शिक्षाओं के माध्यम से प्राप्त होता है। आज के व्याख्यान से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला है। उन्होंने इस विषय पर विभाग द्वारा आगे भी व्याख्यान कराने हेतु प्रेरित किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ ने व्यावहारिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले उद्धरणों के माध्यम से सङ्गीत के गूढ रहस्यों को उजागर किया तथा अमीर खुसरों की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए छंदों के प्रयोग को समझाया। कुलपति महोदय ने संस्कृत विभाग द्वारा इस व्याख्यानमाला के सफल आयोजन हेतु विभाग के प्रति प्रसन्नता प्रकट करते हुए छात्रों को विभागीय प्रत्येक कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता के लिए प्रेरित भी किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीपप्रज्वलन, कुरान की तिलावत, वैदिक मंगलाचरण एवं जामिया तराना से हुआ । कार्यक्रम का कुशल संचालन विभाग के आचार्य डॉ.धनंजय मणि त्रिपाठी द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. जहाँ आरा ने किया। इस कार्यक्रम में विभाग के सभी अध्यापकों एवं छात्रों की सहभागिता रही। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से हुआ।

