अलीगढ़। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में डॉ. कौकब कद्र सज्जाद अली मिर्जा की महत्वपूर्ण पुस्तक “वाजिद अली शाह की साहित्यिक और सांस्कृतिक सेवाएं” के अंग्रेजी अनुवाद के लोकार्पण के अवसर पर रशीद अहमद सिद्दीकी ऑडिटोरियम में एक गरिमामय एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों, छात्रों, साहित्यकारों और पत्रकारों की बड़ी संख्या मौजूद रही।

कार्यक्रम की अध्यक्षता उर्दू विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर आजरमी दुख्त सफवी ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में वाजिद अली शाह की साहित्यिक और सांस्कृतिक सेवाओं के अंग्रेजी अनुवाद की अत्यंत आवश्यकता महसूस की जा रही थी। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से फैलाई गई गलतफहमियों के कारण वाजिद अली शाह की वास्तविक छवि धूमिल हो गई थी, जबकि वे केवल शासक ही नहीं बल्कि महान साहित्यकार, कवि, कलाकार और सांस्कृतिक व्यक्तित्व भी थे। उन्होंने कहा कि यह अनुवाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी वास्तविक पहचान स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद लेखक की पुत्री प्रोफेसर तलअत फातिमा ने किया है। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने इस विषय को अपने पीएचडी शोध के लिए चुना था, जबकि उस समय कुछ शिक्षकों ने उन्हें इस विषय पर कार्य करने से मना किया था। उन्होंने कहा कि वाजिद अली शाह के संबंध में फैली गलतफहमियों ने उनकी साहित्यिक उपलब्धियों को पीछे धकेल दिया था।
प्रोफेसर तलअत फातिमा ने बताया कि उनके पिता ने शोध कार्य के दौरान विभिन्न शहरों की यात्रा कर ऐतिहासिक सामग्री एकत्र की। उन्होंने कहा कि वाजिद अली शाह एक असाधारण साहित्यिक व्यक्तित्व थे। उन्होंने मात्र 26 वर्ष की आयु में 60 हजार शेरों पर आधारित मसनवी “इश्कनामा” लिखी, जबकि 67 वर्ष की आयु में 48,150 शेरों पर आधारित मसनवी “सबा तिल कुलूब” की रचना की। उन्होंने कहा कि इतनी महान साहित्यिक सेवाओं के बावजूद उन्हें केवल एक विलासी शासक के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास के साथ अन्याय है।

प्रसिद्ध पत्रकार शकील हसन शम्सी ने अपने संबोधन में कहा कि अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह की छवि खराब करने के लिए अनेक प्रयास किए। उन्होंने बताया कि उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी ने कई समाचार पत्रों का उपयोग उनकी छवि धूमिल करने के लिए किया था। उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह है कि वाजिद अली शाह साहित्य, संगीत, नृत्य, तहजीब और ललित कलाओं के महान संरक्षक थे।
कार्यक्रम में अन्य वक्ताओं ने भी वाजिद अली शाह की साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सेवाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद वैश्विक स्तर पर उर्दू साहित्य और अवध की तहजीब को नई पहचान दिलाने में सहायक सिद्ध होगा।
कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर जौहर ने किया। इस अवसर पर नुजहत फातिमा, प्रोफेसर तारिक छतारी, प्रोफेसर सिराज अजमली तथा उर्दू विभाग के अध्यक्ष कमरुल हुदा फरीदी सहित अनेक विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के अंत में पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद को शैक्षणिक जगत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए लेखक और अनुवादक को बधाई दी गई।

