लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मदरसा कर्मचारियों को सरकारी दफ्तरों में तैनात करने के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। मदरसा शिक्षा बोर्ड ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रदेश के सभी जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों (डीएमओ) को निर्देश दिया है कि मदरसों से संबद्ध कनिष्ठ सहायकों (लिपिकों) को तत्काल प्रभाव से कार्यालयों से हटाया जाए। आदेश की अनदेखी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
मामला उस शिकायत से जुड़ा है जिसमें आरोप लगाया गया था कि निजी मदरसों में नियुक्त लिपिकों से सरकारी और गोपनीय कार्य कराए जा रहे हैं। जबकि नियमों के अनुसार निजी संस्थानों के कर्मचारियों को सरकारी कार्यालयों में जिम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती।
हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ता इंजीनियर तलहा अंसारी ने आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर दावा किया कि लखनऊ, बाराबंकी समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आज भी मदरसों के कर्मचारी डीएमओ कार्यालयों में कार्यरत हैं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ स्थानों पर बिना किसी वैध आदेश के कर्मचारियों से सरकारी कार्य लिया जा रहा है।
शिकायत के बाद मदरसा शिक्षा बोर्ड की रजिस्ट्रार अंजना सिरोही ने 12 जून को सभी जिलों को पत्र जारी कर कहा कि वर्ष 2023 में जारी आदेशों का तत्काल पालन सुनिश्चित किया जाए और मदरसा कर्मचारियों की संबद्धता समाप्त की जाए।
गौरतलब है कि सितंबर 2023 में तत्कालीन निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण जे. रीभा ने भी स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सरकारी कार्यालयों में निजी क्षेत्र के कर्मचारियों से कार्य लेना नियम विरुद्ध है। इसके बावजूद कई जिलों में आदेशों का पालन नहीं हुआ।
अब बोर्ड के ताजा निर्देशों के बाद विभागीय हलकों में हलचल तेज हो गई है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कई जिलों में मदरसा कर्मचारियों की संबद्धता समाप्त होने के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जा सकती है।
सरकारी दफ्तरों में निजी कर्मचारियों की तैनाती को लेकर उठे सवालों के बीच यह कार्रवाई प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

