लेखक।। अज़हर उमरी (वरिष्ठ पत्रकार)
नई दिल्ली/इतिहास विशेष | Times of Taj
23 मार्च 1614 का दिन भारतीय इतिहास में खास अहमियत रखता है। इसी दिन अजमेर में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ और मलिका-ए-हिंद मुमताज़ महल की दूसरी और सबसे अज़ीज़ बेटी, शहज़ादी जहाँआरा बेगम का जन्म हुआ।
जहाँआरा बेगम सिर्फ एक शहज़ादी नहीं थीं, बल्कि अपने दौर की सबसे ताकतवर और असरदार महिलाओं में शुमार की जाती थीं। 1631 में मुमताज़ महल के इंतकाल के बाद महज़ 17 साल की उम्र में उन्हें “बादशाह बेगम” (First Lady of the Empire) का ख़िताब दिया गया। यह सम्मान उस वक्त और भी खास था, क्योंकि उस समय शाहजहाँ की अन्य बेगमें भी ज़िंदा थीं।
सियासत, ताकत और भाईचारे की मिसाल
जहाँआरा ने मुग़ल दरबार में जबरदस्त सियासी असर रखा। उन्होंने वारिसत की जंग में अपने बड़े भाई दारा शिकोह का साथ दिया, जो उनकी सूफियाना सोच और इंसानियत के करीब होने की गवाही देता है।
शाहजहानाबाद की तामीर में अहम किरदार
1648 में जब शाहजहानाबाद (आज की पुरानी दिल्ली) की बुनियाद रखी गई, तो उसकी कई अहम इमारतों की निगरानी खुद जहाँआरा बेगम ने की। कहा जाता है कि शहर की 19 में से 5 प्रमुख इमारतें उनके निर्देशन में बनीं। उन्होंने सराय, मस्जिदें और खैराती कामों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
दरियादिली और सूफियाना रुझान
जहाँआरा बेगम, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मुरीद थीं और सूफी विचारधारा से गहराई से प्रभावित थीं। गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना उनकी पहचान बन गया था।
सादगी की मिसाल बनी कब्र
दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह के सहन में स्थित उनकी कब्र आज भी उनकी सादगी की मिसाल है। जहाँ उनकी माँ मुमताज़ महल का मकबरा ताजमहल जैसे भव्य स्मारक में है, वहीं जहाँआरा ने वसीयत की थी कि उनकी कब्र सादा और खुली हो—बिना किसी पक्के निर्माण के।
उनकी कब्र पर अंकित फारसी शेर आज भी इंसान को झकझोर देता है—
“बग़ैर सब्ज़ा नपोशद कसे मज़ार मरा
कि क़ब्र-ए-ग़रीबाँ हमीं गियाह ओ बस अस्त”
तर्जुमा:
“मेरी कब्र को हरियाली के सिवा कुछ न ढके,
क्योंकि गरीबों की कब्र के लिए घास ही काफी है।”
इतिहास में अमर पहचान
जहाँआरा बेगम को “साहिबत-उज़-ज़मानी” (यानी अपने दौर की सबसे प्रतिष्ठित महिला) के खिताब से नवाज़ा गया। उन्होंने यह साबित किया कि असली शान दौलत या इमारतों में नहीं, बल्कि इंसानियत, सादगी और सेवा में होती है।

