आगरा। सिकंदरा स्थित मस्जिद नहर वाली में जुमे की नमाज़ के दौरान खतीब मुहम्मद इक़बाल साहब ने एक ऐसा पैग़ाम दिया, जिसने नमाज़ियों को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने ज़कात की अदायगी को सिर्फ़ रस्म नहीं, बल्कि समाज बदलने का मजबूत ज़रिया बताया।
ख़ुत्बे की शुरुआत में उन्होंने क़ुरआन करीम की सूरह अल-माइदा (आयत 55) की तिलावत की:
“और जो लोग ईमान लाए, नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते हैं और अल्लाह के आगे झुकने वाले हैं।”
💠 ज़कात: सिर्फ़ मदद नहीं, एक मुकम्मल सिस्टम
खतीब साहब ने कहा कि ज़कात इस्लाम का बेहतरीन सामाजिक और आर्थिक सिस्टम है, जो समाज में पाकीज़गी, बराबरी और संतुलन पैदा करता है। इससे भीख मांगने की प्रवृत्ति को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
उन्होंने अफसोस जताया कि इतना शानदार निज़ाम होने के बावजूद हम आज भी बड़ी संख्या में मोहताज नज़र आते हैं।
💡 छोटी रकम नहीं, बड़ी सोच ज़रूरी
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जो लोग बड़ी रकम ज़कात के तौर पर निकालते हैं, वे उसे अलग-अलग जगह थोड़ी-थोड़ी बांटने के बजाय किसी एक असली ज़रूरतमंद को चुनें।
उसकी पूरी जानकारी लें, उसकी स्थिति समझें और एक तय योजना के तहत उसे इतनी मदद दें कि वह छोटा कारोबार या कोई हुनर शुरू कर सके।
“उसे इस काबिल बनाइए कि वह कल हाथ फैलाने वाला नहीं, बल्कि हाथ देने वाला बने।”
🎯 टारगेट साफ है
उन्होंने कहा, “यह काम मुश्किल हो सकता है, लेकिन नामुमकिन नहीं। हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि इस साल कम से कम एक ज़कात लेने वाला व्यक्ति समाज से कम हो जाए।”
🤝 अब पहल आपकी
अंत में उन्होंने नमाज़ियों से अपील की कि वे खुद इस मुहिम की शुरुआत करें और दूसरों को भी जोड़ें। अगर इस सोच को गंभीरता से अपनाया जाए तो समाज में बड़ी सकारात्मक तब्दीली लाई जा सकती है।
क्या इस रमज़ान आप भी एक ज़िंदगी बदलने का इरादा करेंगे?
अल्लाह तआला हमें ज़कात के सही इस्तेमाल और ज़रूरतमंदों की इज़्ज़त के साथ मदद करने की तौफीक़ अता फरमाए। आमीन।

