आगरा: रमजान का पवित्र महीना इस्लाम धर्म में आध्यात्मिक और शारीरिक शुद्धि का विशेष अवसर माना जाता है। समाजसेवी मोहम्मद आरिफ सिद्दीकी ने कहा कि रमजान केवल रोजा रखने का नाम नहीं, बल्कि आत्मसंयम, अनुशासन और आत्मचिंतन का महीना है।
रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है, जिसे अरबी में ‘रमदान’ भी कहा जाता है। यह इस्लाम के सबसे पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है। इस महीने को तीन हिस्सों में बांटा गया है, प्रत्येक दस दिन के भाग को ‘अशरा’ कहा जाता है। ‘अशरा’ का अर्थ अरबी भाषा में दस होता है।
उन्होंने बताया कि पवित्र ग्रंथ Qur’an की सूरह अल-बकरा (आयत 183) में रोजा हर मुसलमान पर फर्ज बताया गया है। रोजा को अरबी में ‘सौम’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है रुकना या स्वयं को नियंत्रित करना। रोजा केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि झूठ, चुगली, हिंसा, रिश्वत और तमाम बुराइयों से दूर रहने का अभ्यास है।
रोजे के दौरान व्यक्ति दिन भर भूखा-प्यासा रहकर आत्मसंयम का अभ्यास करता है। यदि किसी स्थान पर बुराई या निंदा हो रही हो तो रोजेदार के लिए वहां ठहरना भी उचित नहीं माना गया है। रोजा रखने से इंसान के दिल में गरीबों और जरूरतमंदों के प्रति हमदर्दी पैदा होती है।
मोहम्मद आरिफ सिद्दीकी ने कहा कि रमजान के महीने में नेक कामों का सवाब सत्तर गुना तक बढ़ा दिया जाता है और जकात भी प्रायः इसी महीने में अदा की जाती है। यह महीना इंसान को पूरे वर्ष बुराइयों से बचने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि रोजा इसलिए फर्ज किया गया है ताकि इंसान में तकवा यानी ईश्वर-भय और विनम्रता की भावना विकसित हो। खुदा से डरने का अर्थ यह है कि व्यक्ति अपने भीतर नम्रता, करुणा और सहनशीलता पैदा करे तथा समाज में प्रेम और सद्भाव का संदेश फैलाए।

