सिख इतिहास में श्री गुरु अमरदास जी का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। वे सिखों के तीसरे गुरु थे और उन्होंने अपने जीवन, विचारों तथा कार्यों से समाज को समानता, सेवा, प्रेम और मानवता का अमूल्य संदेश दिया। गुरु अमरदास जी का जन्म वैशाख शुक्ल 14, संवत 1536 विक्रमी (5 मई 1479 ई.) को पंजाब के अमृतसर जिले के बासरके गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम तेज भान भल्ला और माता का नाम सुलखनी देवी था।
62 वर्ष की आयु में बने गुरु
गुरु अमरदास जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सीखने और समाज की सेवा करने की कोई आयु नहीं होती। वे 62 वर्ष की आयु में सिखों के दूसरे गुरु, श्री गुरु अंगद देव जी की शरण में आए। उनकी निष्ठा, विनम्रता और अथक सेवा से प्रभावित होकर गुरु अंगद देव जी ने वर्ष 1552 में उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।
सेवा को बनाया जीवन का आधार
गुरु अमरदास जी ने सेवा को सबसे बड़ी साधना माना। वे स्वयं भी सेवा कार्यों में अग्रणी रहते थे और अपने अनुयायियों को भी यही शिक्षा देते थे कि ईश्वर की सच्ची भक्ति मानवता की सेवा में निहित है। उनका मानना था कि जो व्यक्ति दूसरों के दुख-दर्द को समझता है और उनकी सहायता करता है, वही सच्चा धार्मिक है।
लंगर व्यवस्था को दी नई मजबूती
गुरु अमरदास जी ने “लंगर” की परंपरा को और अधिक सशक्त बनाया। उन्होंने यह व्यवस्था की कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ग या पद का हो, पहले लंगर में बैठकर भोजन करे और उसके बाद ही गुरु से मिले। इस व्यवस्था ने सामाजिक भेदभाव को चुनौती दी और समानता का संदेश पूरे समाज में फैलाया।
उनकी यह सोच आज भी दुनिया भर के गुरुद्वारों में दिखाई देती है, जहां लाखों लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ बैठकर भोजन करते हैं।
महिलाओं के अधिकारों के समर्थक
उस समय समाज में महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। गुरु अमरदास जी ने महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की खुलकर वकालत की। उन्होंने सती प्रथा और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध किया तथा महिलाओं को धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी का अधिकार दिया। यह उस युग में एक क्रांतिकारी कदम था।
समानता और भाईचारे का संदेश
गुरु अमरदास जी ने जाति-पाति, ऊंच-नीच और भेदभाव का विरोध किया। उन्होंने सिखाया कि सभी मनुष्य एक ही परमात्मा की संतान हैं और किसी भी व्यक्ति का मूल्य उसकी जाति या जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से निर्धारित होता है।
उनकी शिक्षाएं आज भी सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा देती हैं।
गोइंदवाल साहिब का विकास
गुरु अमरदास जी ने गोइंदवाल साहिब को सिख धर्म का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र बनाया। यहां उन्होंने प्रसिद्ध बावली (सीढ़ीदार कुआं) का निर्माण कराया, जो आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
आज के समय में गुरु अमरदास जी की प्रासंगिकता
आज जब दुनिया जातीय, धार्मिक और सामाजिक विभाजनों से जूझ रही है, गुरु अमरदास जी का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। सेवा, समानता, महिला सम्मान, भाईचारा और मानवता के उनके आदर्श आधुनिक समाज के लिए मार्गदर्शक हैं।
गुरु अमरदास जी ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि सच्चा धर्म लोगों को जोड़ने, उनके दुख दूर करने और मानवता की सेवा करने में है। उनका प्रकाश पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि उनके महान आदर्शों को याद करने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का अवसर है।
गुरु अमरदास जी का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि समाज की वास्तविक उन्नति प्रेम, सेवा, समानता और मानवता के मार्ग पर चलकर ही संभव है।
लेखक – अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार

