अगर मौलाना सिर्फ़ एक सियासतदां होते, तो शायद हालात से समझौता कर लेते। मगर वह ज़िंदा दिल, अहसासात से भरपूर और उस हिन्दुस्तान के ख़्वाब देखने वाले रहनुमा थे, जहाँ आज़ादी, इल्म और इंसानियत की हुकूमत हो। ग़ुलाम मुल्क में पले-बढ़े, लेकिन पूरी ज़िन्दगी आज़ादी के नाम कर दी। जिस भारत का नक़्शा उनके ज़ेहन में था, बँटवारे के बाद उससे अलग सूरत-ए-हाल को क़बूल करना उनके लिए आसान न था। अपनों के दिए ज़ख़्म उन्होंने ख़ामोशी से सहे, मगर उस दर्द की गहराई को सिर्फ़ उनका दिल ही जानता था।बीमारी की ख़बर और बेचैन मुल्क
19 फ़रवरी 1958 को ऑल इंडिया रेडियो ने इत्तिला दी कि मौलाना को फ़ालिज का हमला हुआ है। डाक्टरों की लाइन लग गई। मुल्क की बड़ी शख़्सियतें—जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद—उनकी ख़ैरियत जानने घर पहुँच गए। डाक्टरों ने 48 घंटे का वक़्त माँगा, लेकिन हालात नाज़ुक थे।21 फ़रवरी को मौत का अंदेशा साफ़ दिखने लगा। कैबिनेट के अरकान मौजूद थे, चेहरों पर मायूसी थी। उलमा-ए-किराम ने क़ुरआन की तिलावत शुरू कर दी। और फिर 22 फ़रवरी 1958 की सुबह सवा दस बजे, यह रोशन चराग़ हमेशा के लिए बुझ गया—मौलाना की रूह अपने रब से जा मिली।एक ऐसी रुख़्सती जिस पर मुल्क रो पड़ा
वफ़ात की ख़बर फैली तो दिल्ली सिसक उठी। देखते ही देखते लगभग दो लाख का हुजूम उनके घर पर उमड़ आया। सरकारी-ग़ैर सरकारी दफ़्तर बंद हुए, परचम झुका दिए गए। वह मंज़र कम ही देखने को मिलता है जब काबा के मानने वाले और कलीसा के मानने वाले, दोनों एक साथ अश्कबार हों—मौलाना की शख़्सियत उन गिने-चुने लोगों में थी जो मज़हबी सरहदों से ऊपर उठ चुके थे।
डाक्टर हैरान थे कि जिस्म के जवाब दे देने के बाद भी दिमाग़ कुछ वक़्त तक हरकत में रहा। आख़िरी लम्हों में उन्होंने इशारा करके कहा—“अब मुझे अल्लाह के हवाले छोड़ दीजिए, और इस पिंजरे से आज़ाद कर दीजिए।” होश आता तो होंठों पर क़ुरआन की आयतें होतीं।
आँसुओं के दरमियान आख़िरी विदाई
क़ारी तैयब बेहोशी के आलम में थे। लाल बहादुर शास्त्री और मोरारजी देसाई की आँखें नम थीं। पंडित नेहरू बार-बार भीड़ में चले जाते; सिक्योरिटी रोकती तो कह उठते—“क्या तुम मौत को रोक सकते हो?” घर में मौलाना की बहन आरज़ू बेगम ग़म से निढाल थीं; पास ही इंदिरा गांधी और अरुणा आसफ़ अली मौजूद थीं।दोपहर एक बजे जनाज़ा उठा। अरब मुल्कों के सफ़ीर ने पहला कंधा दिया। फ़ौज की ज़मीनी, हवाई और समुद्री टुकड़ियों ने सलामी पेश की। नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद इस महान रहनुमा को सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया—अपने मालिक-ए-हक़ीक़ी से मुलाक़ात के लिए।
एक खालीपन जो आज भी महसूस होता है
दफ़्न के बाद पंडित नेहरू मौलाना की कोठी लौटे। कभी किताबें पलटते, कभी उस क्यारी में जाकर खड़े हो जाते जहाँ मौलाना टहला करते थे। फूलों को देखकर जैसे ख़ामोशी से पूछ रहे हों—“क्या वह मुस्कान अब भी लौटेगी?”मौलाना अबुल कलाम आज़ाद—आज़ाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष, और इमाम-उल-हिन्द—ने सिर्फ़ सियासत नहीं की, बल्कि इल्म और वतनपरस्ती की बुनियादें मज़बूत कीं। उनकी रुख़्सती एक शख़्स की नहीं, एक दौर की रुख़्सती थी।22 फ़रवरी 1958 का दिन हमें याद दिलाता है कि कुछ लोग जिस्मानी तौर पर रुख़्सत हो जाते हैं, मगर उनके ख़्वाब, उनका इल्म और उनकी मोहब्बत हमेशा ज़िन्दा रहती है।

