लेखक: अज़हर उमरी
उर्दू अदब की तारीख़ में 15 फ़रवरी एक दर्दनाक मगर रोशन याद लेकर आती है। यह वही दिन है जब 1869 में दिल्ली की सरज़मीन पर फ़िक्र-ओ-फ़न का आफ़ताब ग़ुरूब हुआ — मिर्ज़ा ग़ालिब ने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा। मगर हक़ीक़त यह है कि ग़ालिब का जिस्म ही रुख़्सत हुआ, उनका कलाम आज भी ज़िंदा है, दिलों में धड़कता है और ज़ेहन को रौशन करता है।
मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ाँ उर्फ़ ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी अदब की वह बुलंद शख़्सियत हैं, जिनके बग़ैर शायरी की तारीख़ अधूरी महसूस होती है। उन्होंने फ़ारसी शायरी की नफ़ासत, तख़य्युल की ऊँचाई और फ़लसफ़े की गहराई को हिंदुस्तानी ज़बान में इस अंदाज़ से पेश किया कि उर्दू को एक नई पहचान और नई शान मिली। उनका हर शे’र महज़ अल्फ़ाज़ का तर्जुमा नहीं, बल्कि एहसास और तजुर्बे का आईना है।
1850 में आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने ग़ालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला के ख़िताबात से नवाज़ा। यह एहतराम उनकी इल्मी बुलंदी का एतराफ़ था, लेकिन ग़ालिब की असली पहचान किसी दरबारी ख़िताब की मोहताज नहीं थी। उनका असल सरमाया उनका दीवान था — वह दीवान जिसने इश्क़, दर्द, तन्हाई, तसव्वुर, ज़िंदगी और इंसानियत के तमाम रंगों को अपने दामन में समेट लिया।
ग़ालिब की शायरी महज़ इश्क़िया जज़्बात तक सीमित नहीं। उसमें फ़लसफ़ा-ए-हयात भी है, समाजी एहसास भी और इंसानी कमज़ोरियों पर नर्म-ओ-नाज़ुक तंज़ भी। वह दर्द को भी इस अंदाज़ में बयान करते हैं कि पढ़ने वाला मुस्कुरा उठे। यही वजह है कि उनका कलाम हर दौर में नया लगता है।
उनका मशहूर शे’र आज भी उनकी अज़मत का ऐलान करता है—
“हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।”
आख़िरी दिनों में उनकी सेहत कमज़ोर हो चुकी थी, मगर ज़ेहन की चमक और ज़बान की चुटकी आख़िरी लम्हों तक बरक़रार रही। उनका यह जिंदादिल अंदाज़ उनकी शख़्सियत का अहम हिस्सा था। यही वजह है कि आज भी जब दिल्ली में ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया के क़रीब उनकी मज़ार पर अदब-दोस्त हाज़िरी देते हैं, तो उन्हें महज़ एक शायर की क़ब्र नहीं, बल्कि उर्दू तहज़ीब की एक ज़िंदा निशानी नज़र आती है।
ग़ालिब ने अपने दौर की तब्दीलियों, सियासी उलटफेर और इंसानी हालात को जिस गहराई से महसूस किया, वह उन्हें हर ज़माने का शायर बनाता है। वह अतीत का हिस्सा नहीं — वह आज भी हमारे साथ हैं, हमारे जज़्बात में, हमारी ज़बान में और हमारी सोच में।
टाइम्स ऑफ ताज की तरफ़ से हम उर्दू अदब के इस अज़ीम सितारे को दिली ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं।
ग़ालिब सिर्फ़ एक नाम नहीं, एक एहसास हैं।
सिर्फ़ एक शायर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल तहज़ीब की पहचान हैं।
जब तक उर्दू ज़बान ज़िंदा है,
ग़ालिब का नाम भी ज़िंदा रहेगा।

