लेखिका: तबस्सुम अब्बास
शिक्षाविद एवं सामाजिक चिंतक
10 सितंबर केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है जब देश एक ऐसे वीर सपूत को याद करता है, जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। वीर अब्दुल हमीद का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में साहस, शौर्य, कर्तव्य और देशभक्ति की ऐसी मिसाल है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी गर्व के साथ याद करती रहेंगी।
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जब दुश्मन के शक्तिशाली अमेरिकी पैटन टैंक भारतीय मोर्चों को चुनौती दे रहे थे, तब एक भारतीय सैनिक ने अपने अदम्य साहस से यह साबित कर दिया कि युद्ध केवल हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि हौसले, रणनीति और मातृभूमि के प्रति समर्पण से जीता जाता है।
वह वीर सैनिक थे—कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद।
जब सामने थे दुश्मन के विशाल टैंक और पीछे था तिरंगा
सितंबर 1965 में पंजाब के असल उत्तर के मोर्चे पर भारतीय सेना और पाकिस्तानी सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ। पाकिस्तान को अपने आधुनिक पैटन टैंकों की ताकत पर बहुत भरोसा था। उसके सामने भारतीय सेना के जवानों के लिए चुनौती बेहद कठिन थी।
लेकिन वीर अब्दुल हमीद ने चुनौती को देखकर पीछे हटना नहीं सीखा था।
उन्होंने अपनी जीप पर लगी 106 मिमी रिकॉयलेस राइफल के माध्यम से दुश्मन के टैंकों को निशाना बनाया। अत्यंत साहस और असाधारण सैन्य कौशल का परिचय देते हुए उन्होंने कई पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट किया।
उनकी वीरता ने युद्धभूमि का माहौल बदल दिया। जिस दुश्मन को अपने टैंकों की शक्ति पर घमंड था, उसे भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस का सामना करना पड़ा।
आखिरी सांस तक लड़ते रहे
10 सितंबर 1965 को असल उत्तर के युद्धक्षेत्र में वीर अब्दुल हमीद ने देश की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
वह शहीद हो गए, लेकिन उनका साहस अमर हो गया।
उनकी वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
यह सम्मान केवल एक सैनिक को दिया गया पदक नहीं था, बल्कि यह उस अदम्य भारतीय जज़्बे की पहचान था, जो मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति में भी मातृभूमि की रक्षा के लिए डटा रहता है।
वीर अब्दुल हमीद की कहानी हमें क्या सिखाती है?
आज जब हम वीर अब्दुल हमीद को याद करते हैं, तो हमें केवल उनके द्वारा नष्ट किए गए टैंकों की संख्या याद नहीं करनी चाहिए। हमें उनके जीवन से वह भावना सीखनी चाहिए, जिसने उन्हें अपने प्राणों से अधिक देश की सुरक्षा को महत्व देने की प्रेरणा दी।
उनकी कहानी बताती है कि—
देशभक्ति किसी धर्म, जाति या भाषा की मोहताज नहीं होती।
भारत की मिट्टी ने अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और समुदायों से आने वाले अनगिनत वीरों को जन्म दिया है। जब सीमा पर तिरंगा खतरे में होता है, तब सैनिक की पहली और आखिरी पहचान केवल भारत का सिपाही होती है।
वीर अब्दुल हमीद इसी भारत की साझा विरासत के प्रतीक हैं।
आज के युवाओं को वीर अब्दुल हमीद को पढ़ने की जरूरत क्यों है?
आज की पीढ़ी के सामने चुनौतियां युद्ध के मैदान जैसी दिखाई नहीं देतीं, लेकिन देश के निर्माण की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी है।
आज युवाओं को शिक्षा, ईमानदारी, अनुशासन, मेहनत, सामाजिक जिम्मेदारी और देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझने की जरूरत है।
वीर अब्दुल हमीद ने हमें सिखाया कि साधन छोटे हो सकते हैं, लेकिन संकल्प बड़ा होना चाहिए।
एक साधारण सैनिक ने असाधारण साहस के बल पर इतिहास में अपना नाम अमर कर दिया।
यही कारण है कि उनकी कहानी केवल सेना के जवानों की कहानी नहीं है। यह हर उस भारतीय की कहानी है जो अपने देश के लिए कुछ अच्छा करना चाहता है।
शहादत को सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, संकल्प बनाएं
हर वर्ष बलिदान दिवस पर हम वीर अब्दुल हमीद को श्रद्धांजलि देते हैं। तस्वीरों पर पुष्प अर्पित करते हैं, उनके शौर्य को याद करते हैं और उनके नाम के नारे लगाते हैं।
लेकिन सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब हम उनके आदर्शों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएंगे।
हम अपने बच्चों को उनके बारे में बताएंगे। उन्हें बताएंगे कि भारत की आजादी और सुरक्षा केवल किताबों का विषय नहीं, बल्कि हजारों-लाखों बलिदानों की विरासत है।
हमें अपने बच्चों को यह भी समझाना होगा कि देश से प्रेम केवल सीमा पर जाकर बंदूक उठाने से नहीं होता। ईमानदारी से अपना काम करना, समाज में भाईचारा कायम रखना, कमजोर की मदद करना, शिक्षा को बढ़ावा देना और देश की एकता को मजबूत करना भी राष्ट्रसेवा है।
वीर अब्दुल हमीद कभी नहीं मर सकते
शरीर नश्वर है, लेकिन विचार और आदर्श अमर होते हैं।
वीर अब्दुल हमीद का शरीर 10 सितंबर 1965 को पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनका साहस आज भी भारतीय सेना की वीरगाथाओं में जीवित है।
जब भी कोई भारतीय सैनिक तिरंगे की ओर देखकर देश की रक्षा का संकल्प लेता है, जब भी कोई युवा कठिन परिस्थितियों के सामने हार मानने से इनकार करता है और जब भी कोई भारतीय देश की एकता और अखंडता के लिए खड़ा होता है—तब कहीं न कहीं वीर अब्दुल हमीद की वीरता की वह लौ फिर जल उठती है।
वीर अब्दुल हमीद को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह वर्तमान को जिम्मेदार और भविष्य को मजबूत बनाने का संकल्प है।
आज उनके बलिदान दिवस पर आइए, हम उनके चरणों में श्रद्धा के साथ नमन करें और संकल्प लें कि जिस भारत की रक्षा के लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर किया, उस भारत की एकता, अखंडता, शांति और सम्मान को हमेशा सर्वोपरि रखेंगे।
वीर अब्दुल हमीद अमर रहें।
भारत माता के वीर सपूत को शत-शत नमन।
— तबस्सुम अब्बास
शिक्षाविद एवं सामाजिक चिंतक
