लेखिका – बेगम तबस्सुम अब्बास
(शिक्षका एवं सामाजिक चिंतक )
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 6 मई 1967 का दिन एक गौरवपूर्ण और ऐतिहासिक क्षण के रूप में दर्ज है। इसी दिन महान शिक्षाविद, राष्ट्रनायक और विद्वान Zakir Husain ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद—राष्ट्रपति पद की शपथ ली और भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बनने का सम्मान प्राप्त किया।
यह सिर्फ एक संवैधानिक नियुक्ति नहीं थी, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की एक मजबूत मिसाल भी थी। उनका राष्ट्रपति बनना इस बात का प्रतीक था कि भारत में प्रतिभा, समर्पण और ईमानदारी को धर्म और जाति से ऊपर रखा जाता है।
विनम्र शुरुआत से राष्ट्रपति भवन तक
8 फरवरी 1897 को हैदराबाद में जन्मे डॉ. जाकिर हुसैन का जीवन संघर्ष, मेहनत और शिक्षा के प्रति समर्पण की प्रेरणादायक कहानी है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद Aligarh Muslim University से जुड़कर उच्च शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया।
वे Jamia Millia Islamia के संस्थापकों में से एक थे और लंबे समय तक इसके कुलपति रहे। उनके नेतृत्व में जामिया ने न केवल शैक्षणिक ऊंचाइयों को छुआ, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक समरसता का भी केंद्र बना।
शिक्षा के प्रति समर्पित एक महान विचारक
डॉ. हुसैन का मानना था कि “शिक्षा ही राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत नींव है।” वे केवल एक प्रशासक नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी शिक्षाविद और चिंतक थे। उनके प्रयासों से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा मिली।
उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें 1963 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान Bharat Ratna से सम्मानित किया गया।
राष्ट्रपति के रूप में सादगी और आदर्श
13 मई 1967 को राष्ट्रपति पद संभालने के बाद डॉ. जाकिर हुसैन ने अपने कार्यकाल में सादगी, ईमानदारी और संवैधानिक मूल्यों की मिसाल पेश की। वे हर धर्म और समुदाय के प्रति समान सम्मान रखते थे और देश की एकता व अखंडता के प्रबल समर्थक थे।
आज भी प्रासंगिक है उनका संदेश
डॉ. जाकिर हुसैन का जीवन हमें यह सिखाता है कि शिक्षा, सहिष्णुता और मानवता के रास्ते पर चलकर ही एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है। आज जब समाज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनके विचार और आदर्श पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।

