आजकल यह आम बात हो गई है कि विवाह के बाद कई लड़कियाँ अपने सास-ससुर को “मम्मी-पापा” कहकर संबोधित करती हैं। यह भारतीय संस्कृति की उस भावना का प्रतीक है जिसमें विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है। लेकिन कभी-कभी यह भी देखने और सुनने में आता है कि कुछ लोग मायके में या दोस्तों के बीच उसी सास-ससुर के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर देते हैं। ऐसे व्यवहार पर विचार करना आवश्यक है।
किसी भी रिश्ते की गरिमा केवल सामने किए गए सम्मान से नहीं, बल्कि पीठ पीछे कही गई बातों से भी तय होती है। यदि हम किसी बुज़ुर्ग को सामने “मम्मी-पापा” कहें और पीछे उनका मज़ाक उड़ाएँ या अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करें, तो यह हमारे संस्कारों और व्यक्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
यह बात केवल बहुओं पर ही लागू नहीं होती। कई बार दामाद भी अपने सास-ससुर के लिए, या बेटे अपने माता-पिता के लिए, या परिवार के अन्य सदस्य भी बुज़ुर्गों के प्रति अनुचित भाषा का प्रयोग करते हैं। गलत व्यवहार किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। सम्मान और असम्मान का पैमाना सभी के लिए समान होना चाहिए।
हर परिवार में मतभेद हो सकते हैं। विचारों का टकराव भी स्वाभाविक है। लेकिन असहमति का अर्थ अपमान नहीं होता। यदि रिश्तों में सम्मान बना रहे, तो संवाद के रास्ते खुले रहते हैं और परिवार मजबूत बनता है।
शब्दों का चुनाव हमारे संस्कारों का परिचय देता है। इसलिए चाहे अपने माता-पिता हों, सास-ससुर हों या परिवार के कोई भी बुज़ुर्ग—उनके लिए सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। रिश्ते प्रेम, विश्वास और सम्मान से ही लंबे समय तक टिकते हैं, व्यंग्य और अपमान से नहीं।
लेखक। अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक चिंतक

