हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) की पैदाइश — इंसानियत के लिए एक पैग़ाम
इतिहास में कुछ दिन ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ तारीख़ नहीं होते, बल्कि तहरीक बन जाते हैं। इस्लामी इतिहास में 13 रजब का दिन ऐसा ही एक दिन है, जब इंसानियत को वह हस्ती नसीब हुई जिसने इंसाफ़ को ज़िंदगी, हिम्मत को पहचान और इल्म को मक़सद बना दिया। यही वह दिन है जब हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) की पैदाइश हुई — और वह भी ख़ाना-ए-काबा के अंदर۔
यह कोई मामूली वाक़िया नहीं, बल्कि एक इलाही इशारा है कि आने वाला शख़्स सिर्फ़ किसी घर या क़बीले का नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत का रहनुमा होगा।
काबा ने जिसे गोद में लिया
इतिहास गवाह है कि हज़रत अली (अ.स.) की वालिदा हज़रत फ़ातिमा बिन्ते असद (र.अ.) जब तवाफ़ कर रही थीं, तो काबा की दीवार शग़ाफ़ हुई और वह उसके भीतर दाख़िल हो गईं। तीन दिन बाद जब बाहर आईं, तो उनकी गोद में वह बच्चा था जिसे दुनिया अमीरुल मोमिनीन के नाम से जानेगी।
काबा में जन्म लेने का यह शरफ़ न इससे पहले किसी को मिला، न इसके बाद। यह इस बात का ऐलान था कि जो इंसाफ़ का इमाम होगा, उसका आग़ाज़ भी तौहीद के घर से होगा।
बचपन से नबी ﷺ की गोद में
हज़रत अली (अ.स.) का बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था। उन्होंने होश संभाला तो खुद को हज़रत मुहम्मद ﷺ की गोद में पाया। आप ﷺ ने उन्हें अपने घर में पाला، अपने साये में बड़ा किया और अपने किरदार से इंसानियत सिखाई।
यही वजह है कि जब नुबूवत का ऐलान हुआ, तो सबसे पहले ईमान लाने वालों में एक मासूम बच्चा अली (अ.स.) भी था۔ यह ईमान सिर्फ़ ज़बान का नहीं, बल्कि फितरत का था।
पैदाइश जो पैग़ाम बन गई
हज़रत अली (अ.स.) की पैदाइश हमें यह सिखाती है कि:
- इल्म बिना अख़लाक़ अधूरा है
- ताक़त बिना इंसाफ़ ज़ुल्म बन जाती है
- इबादत बिना इंसानियत बे-मक़सद है
आपकी ज़िंदगी इस बात का सबूत है कि सत्ता नहीं, सच्चाई बड़ी होती है; तलवार नहीं, इंसाफ़ क़ायम रहता है; और हुकूमत नहीं, किरदार अमर होता है।
आज के दौर के लिए हज़रत अली (अ.स.)
आज जब दुनिया ज़ुल्म, नफ़रत, भेदभाव और लालच से जूझ रही है, तब हज़रत अली (अ.स.) की पैदाइश हमें याद दिलाती है कि:
- भूखे को खाना खिलाना इबादत है
- कमज़ोर के साथ खड़ा होना ईमान है
- सच कहना सबसे बड़ी बहादुरी है
हज़रत अली (अ.स.) किसी एक फिरक़े, मज़हब या दौर तक सीमित नहीं हैं। वह हर उस इंसान के रहनुमा हैं जो इंसाफ़, सच्चाई और इंसानियत पर यक़ीन रखता है।
निष्कर्ष
13 रजब सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि एक क़सम है —
ज़ुल्म के ख़िलाफ़,
झूठ के ख़िलाफ़,
और हर दौर में हक़ के साथ खड़े रहने की।
हज़रत अली (अ.स.) की पैदाइश हमें यह एहसास दिलाती है कि अगर किरदार मज़बूत हो, तो इंसान खुद एक इंक़लाब बन जाता है।
✦ लेखक: अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार, शिक्षाविद और सामाजिक चिंतक

