बरेली/शेरपुर, – रुहेलखंड के बरेली जिले के सैंथल कस्बे में 21 मार्च 1810 को जन्मे नवाब सैय्यद गालिब अली तातारी को उनके शहादत और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए याद किया गया। नवाब साहब एक गुमनाम मुजाहिदी थे, जिन्होंने 1857 के ग़दर के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नवाब गालिब अली साहब के पिता का नाम सैय्यद मुनीर अली और माता का नाम सैय्यदा मजीदुन्निसा बेगम था। उनके पूर्वज सैय्यद जलालुद्दीन लाड बारह मुग़ल बादशाह अकबर के मन्सबदार थे। 1559 में फतह मालवा के बाद पांच परगनों की जागीर उन्हें मुग़ल दरबार से मिली। उनके दादा सैय्यद मुराद अली और पिता मुनीर अली का नवाब हाफ़िज़ रहमत खान से घनिष्ठ संबंध था।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नवाब खान बहादुर खान ने रुहेलखंड के जागीरदारों, राजाओं और जमींदारों से अंग्रेज़ों के खिलाफ युद्ध का आह्वान किया। नवाब गालिब अली ने अपनी दौलत और फौजी टुकड़ी भेजकर उनकी सहायता की। इसके परिणामस्वरूप उन्हें ‘नाज़िमे देह’ का खिताब प्रदान किया गया। उनके नेतृत्व में कई स्वतंत्रता सेनानियों को उनके गांवों बिजासन, चठिया रज्जब अली और मौज्जम नगला में पनाह दी गई।
गदर के अंत के बाद अंग्रेज़ों ने नवाब साहब पर मुकदमा चलाया, भारी हर्जाना लगाया और उनकी संपत्ति जब्त कर उन्हें हवेली में नजरबंद कर दिया। उनके सहयोगी खेमकरन अहिर और भोलेबेलदार को फांसी दी गई। नवाब साहब ने उनके स्मरण में पट्टी गांव में मोहन मंदिर बनवाया और संबंधित परिवारों को ज़मीन भरण-पोषण के लिए दी।
नवाब साहब की मौत हवेली में नजरबंदी के दौरान 18 अक्टूबर 1863 को हुई। उनके वंशज आज भी उनके द्वारा बनवाए गए मोहन मंदिर और अन्य वक्फ संपत्तियों की देखभाल कर रहे हैं। नवाब साहब ने सैंथल बाजार में मस्जिद मय-चाह और कर्बला का निर्माण भी कराया।
नवाब सैय्यद गालिब अली तातारी का योगदान और शहादत बरेली गजेटियर और स्थानीय इतिहास में दर्ज है। उनके वंशज शाह उर्फी रजा जैदी ने इस विरासत को संरक्षित करने के लिए सरकार को अवगत कराया है।
स्रोत: शाह उर्फी रजा जैदी, प्रपौत्र नवाब सैय्यद गालिब अली तातारी
लेखक: हसरत अली, शेरपुर, जिला मुज़फ्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश
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