पैग़म्बर मोहम्मद ﷺ की क़ब्र मदीना मुनव्वरा में मस्जिद-ए-नबवी के भीतर स्थित है, लेकिन उसे कोई इंसान देख नहीं सकता। क़ब्र के चारों ओर ऐसी दीवारें और परकोटे बनाए गए हैं जिनमें न दरवाज़ा है, न खिड़की। इस तरह क़ब्र-ए-मुबारक को आम निगाहों से पूरी तरह महफ़ूज़ रखा गया है।
इस्लामी इतिहासकारों के अनुसार आख़िरी बार जिस शख़्स के बारे में यह उल्लेख मिलता है कि वे उस हुजरे के भीतर दाख़िल हुए, उनका नाम नूरुद्दीन अल-सम्हूदी है—जो मदीना के प्रसिद्ध इतिहासकार थे। यह घटना लगभग पंद्रहवीं सदी ईस्वी के अंतिम दौर से जोड़ी जाती है। तब से लेकर आज तक, यानी पाँच सौ से अधिक वर्षों से, क़ब्र-ए-मुबारक किसी भी इंसान की सीधी निगाह में नहीं आई। यही कारण है कि पैग़म्बर ﷺ की क़ब्र की कोई तस्वीर मौजूद नहीं है।
हदीस और प्रारंभिक ऐतिहासिक स्रोतों में क़ब्र का जो वर्णन मिलता है, उसके अनुसार वह एक सादा मिट्टी की क़ब्र थी, जिस पर कुछ लाल पत्थर रखे गए थे। आरंभ में वह उभरी हुई थी, जो समय के साथ समतल होती चली गई। उससे आने वाली ख़ुशबू के कारण उस स्थान को “हुजरा-अल-मुअत्तरा” (ख़ुशबू वाला कक्ष) कहा जाने लगा।
उसी कमरे में पैग़म्बर ﷺ के दो सबसे क़रीबी साथियों—हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ और हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हुमा), जो पहले दो ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन भी थे—की क़ब्रें भी मौजूद हैं। ये क़ब्रें भी किसी को दिखाई नहीं देतीं। उसी हुजरे में एक चौथी जगह खाली छोड़ी गई है, जिसके बारे में इस्लामी रिवायतों में यह कहा जाता है कि वह हज़रत ईसा इब्ने मरयम (अलैहिस्सलाम) के लिए रखी गई है, जब वे आख़िरी ज़माने में लौटेंगे और फिर इस दुनिया से रुख़्सत होंगे।
पैग़म्बर ﷺ का इंतक़ाल उनकी पत्नी हज़रत आयशा (रज़ि.) के कमरे में हुआ था और तीसरे दिन वहीं दफ़न किया गया। दो वर्ष बाद उनके वालिद हज़रत अबू बकर को भी उसी कमरे में दफ़न किया गया। हज़रत आयशा की इच्छा थी कि उन्हें भी वहीं दफ़न किया जाए, लेकिन हज़रत उमर की शहादत के बाद उन्होंने कहा कि उस स्थान पर उमर का हक़ उनसे ज़्यादा है। इसके बाद उन्होंने परदा लगा लिया, मगर जीवन भर उसी कमरे में रहीं।
यह कमरा आरंभ में मस्जिद-ए-नबवी से सटा हुआ था। बाद में जब मस्जिद का विस्तार हुआ, तो इसी हुजरे के ऊपर हरा गुंबद (गुम्बद-ए-ख़ज़रा) बनाया गया। क़ब्र के चारों ओर पाँच कोणों वाली दीवार इसलिए उठाई गई, ताकि काबा की तरह उसकी तवाफ़ न की जाने लगे। बाद में एक और दीवार खड़ी की गई और उस पर हरी चादरें डाली गईं।
आज जब ज़ायरीन मस्जिद-ए-नबवी में हाज़िरी देते हैं, तो वे कशीदाकारी वाले जंगले के सामने खड़े होकर दरअसल उसी दीवार को देखते हैं—क़ब्र को नहीं। पैग़म्बर ﷺ की क़ब्र अब इंसानी आँखों से देखी नहीं जा सकती।
और शायद यही इस्लाम की रूह के सबसे क़रीब है। इस्लाम बुतपरस्ती और मज़ार-परस्ती की सख़्त मुख़ालफ़त करता है। अगर क़ब्र-ए-मुबारक आम दीदार के लिए खुली होती, तो वहाँ मज़ार की शक्ल बन जाती, रस्में शुरू हो जातीं, और तौहीद की बुनियादी शिक्षा प्रभावित होती। क़ब्र को निगाहों से ओझल रखकर इस संभावना को शुरू से ही ख़त्म कर दिया गया।
जिस नबी ﷺ की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती, जिसकी कोई मूर्ति नहीं हो सकती—उसकी क़ब्र का दीदार भी ज़रूरी नहीं। निराकार ईश्वर और निराकार बंदगी के प्रति यही गहरी निष्ठा इस्लाम की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है।

