आगरा। मेवा कटरा स्थित ख़ानक़ाह क़ादरिया नियाज़िया इन दिनों रूहानियत और अकीदत के नूर से जगमगा रही है, जहां महान सूफी बुज़ुर्ग हज़रत सय्यद मुहमम्द अली शाह कादरी नियाज़ी के सालाना चार दिवसीय उर्स का आगाज़ 29 मार्च से हो चुका है। यह सिलसिला 1 अप्रैल 2026 तक पूरे जोश-ओ-ख़रोश के साथ जारी रहेगा।
देश के कोने-कोने से आए अक़ीदतमंदों और मुरीदीन की मौजूदगी ने ख़ानक़ाह के माहौल को पूरी तरह सूफियाना बना दिया है, जहां हर तरफ इबादत, मुहब्बत और इंसानियत का पैगाम सुनाई दे रहा है।

मीलाद, कुरआनख्वानी और कव्वाली से सज रही हैं महफिलें
उर्स की शुरुआत 29 मार्च (इतवार) को नमाज़-ए-ज़ुहर के बाद मीलाद शरीफ से हुई। इसके बाद अस्र के बाद कुल की रस्म अदा की गई और रात 9 बजे से महफिल-ए-कव्वाली का आयोजन हुआ, जिसने देर रात तक अकीदतमंदों को झूमने पर मजबूर कर दिया। लंगर का सिलसिला भी लगातार जारी रहा।
दूसरे दिन 30 मार्च (सोमवार) को नमाज़-ए-फज्र के बाद कुरआनख्वानी हुई। जौहर के बाद लंगर तक्सीम किया गया, जबकि शाम 3 बजे कव्वाली और कुल की रस्म के बाद रंग की महफिल ने समां बांध दिया।
31 मार्च को चांद की 11वीं तारीख़ के मौके पर हुज़ूर ग़ौस -ए-आज़म की फ़ातिहा का आयोजन होगा, जो उर्स का एक अहम हिस्सा माना जाता है।
उर्स का समापन 1 अप्रैल को मग़रिब के बाद शाम 7 बजे फातिहा दस्तरख्वान के साथ होगा, जो सरदार-उल-अंबिया हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.) के नाम से पेश किया जाएगा।
सज्जादा नशीन की दुआ: अमन और इंसानियत का पैगाम
इस मौके पर सज्जादा नशीन हज़रत सय्यद अजमल अली शाह कादरी नियाज़ी ने मुल्क और पूरी दुनिया में अमन, भाईचारे और इंसानियत की सलामती के लिए खास दुआ की। उन्होंने कहा कि सूफी परंपरा का असल मकसद इंसानों के दिलों को जोड़ना और मोहब्बत फैलाना है।
सूफी खानकाहें: गंगा-जमुनी तहज़ीब की ज़िंदा मिसाल
भारत में सूफी खानकाहों की परंपरा सदियों पुरानी है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की खानकाह इसका बेहतरीन उदाहरण रही है, जहां हर धर्म और वर्ग के लोग एक साथ जुटते थे।
इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मेवा कटरा की यह खानकाह आज भी गंगा-जमुनी तहज़ीब, इंसानियत और भाईचारे का मजबूत केंद्र बनी हुई है। यहां न सिर्फ रूहानी तालीम दी जाती है, बल्कि उर्दू अदब और सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजा जाता है।
हज़रत मैक़श अकबराबादी: सूफी, शायर और दार्शनिक
हज़रत सय्यद मुहम्मद अली शाह क़ादरी नियाज़ी का जन्म 1902 में आगरा में हुआ। आपने कम उम्र में ही रूहानी इल्म हासिल कर लिया और तसव्वुफ़ की राह पर चल पड़े।
आपकी शख्सियत सिर्फ एक सूफी तक सीमित नहीं थी, बल्कि आप उर्दू अदब के एक बड़े नाम भी थे। आपकी शायरी में सादगी, गहराई और फिक्र का अनोखा संगम देखने को मिलता है।
आपकी शख्सियत से प्रभावित होकर जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी और आल अहमद सुरूर जैसे दिग्गजों ने भी उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश किया।
अकीदत और मोहब्बत का संगम बना उर्स
चार दिनों तक चलने वाला यह उर्स सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इंसानियत, मोहब्बत और भाईचारे का जीवंत प्रतीक है। यहां आने वाला हर शख्स अपने दिल में सुकून और रूहानियत का एहसास लेकर लौटता है।

