फर्रुखाबाद। रमज़ान का मुबारक महीना रहमत, बरकत और मगफिरत का महीना माना जाता है। इस पवित्र महीने में मुसलमान रोज़ा रखते हैं, पांच वक्त की नमाज़ अदा करते हैं, कुरआन-ए-पाक की तिलावत करते हैं और नेकी के कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। मगर रोज़ा रखने के बाद अक्सर लोगों के दिल में यह सवाल उठता है कि क्या उनका रोज़ा अल्लाह की बारगाह में कबूल हुआ या नहीं।
रोज़ा कबूल होने की निशानियां
पूर्व अध्यक्ष जिला पंचायत हाजी तहसीन सिद्दीकी ने जानकारी देते हुए बताया कि रोज़े की असली कबूलियत का फैसला अल्लाह तआला ही फरमाते हैं, लेकिन कुछ ऐसी निशानियां हैं जिनसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि रोज़ा कबूल हुआ या नहीं।
उन्होंने कहा कि सबसे पहली निशानी यह है कि रमज़ान के बाद भी इंसान के अंदर इबादत का जज़्बा कायम रहे। अगर कोई शख्स रोज़े के बाद भी पांच वक्त की नमाज़ पढ़े, झूठ, ग़ीबत, चुगली और गुस्से से बचे तथा नेक कामों में दिलचस्पी बनाए रखे, तो यह इस बात का इशारा है कि उसका रोज़ा कबूल हो गया। लेकिन अगर कोई सिर्फ भूखा-प्यासा रहकर अल्लाह के बताए रास्ते पर न चले, तो उसने महज़ फाका किया।
सब्र और विनम्रता भी है पहचान
हाजी तहसीन सिद्दीकी ने आगे बताया कि दूसरी अहम निशानी इंसान के अंदर सब्र, सहनशीलता और विनम्रता का पैदा होना है। अगर रमज़ान के दौरान व्यक्ति अपनी बुरी आदतों से दूर रहे और रमज़ान के बाद भी उनसे बचने की कोशिश करे, तो यह रोज़े की कबूलियत का संकेत है।
गरीबों की मदद का जज़्बा
छिबरामऊ विधानसभा के पूर्व विधायक ताहिर हुसैन सिद्दीकी ने कहा कि रोज़े की एक और बड़ी पहचान यह है कि इंसान के दिल में गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों की मदद का जज़्बा पैदा हो। अगर रमज़ान के बाद भी वह जरूरतमंदों की सहायता करता रहे, भूखों को खाना खिलाए और समाज के कमजोर तबके के साथ अच्छा व्यवहार करे, तो यह इस बात का मजबूत संकेत है कि अल्लाह ने उसके रोज़े को कबूल फरमा लिया है।
नीयत और सच्चाई है सबसे अहम
उलमा ने इस बात पर जोर दिया कि रोज़े की असली कबूलियत का इल्म सिर्फ अल्लाह के पास है। इंसान का काम अपनी नीयत को साफ रखना, रोज़े के मकसद को समझना और सच्चे दिल से तौबा करना है।
नबी-ए-करीम हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने भी फरमाया है कि अल्लाह बंदे की नीयत और दिल की सफाई को देखता है। अगर रोज़ा सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए रखा जाए और इबादत में सच्चाई हो, तो यकीनन अल्लाह उसे कबूल फरमाता है।
इसलिए रोज़ों की फिक्र करने के बजाय अपनी नीयत और अमल को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। अगर नीयत पाक और अमल नेक हो, तो अल्लाह तआला अपनी रहमतों से नवाज़ता है।

